PM Modi Abuse Case: सोशल मीडिया पोस्ट पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, अभिव्यक्ति की आजादी की क्या है सीमा?
अगर सोशल मीडिया पर राजनीतिक आलोचना की जाए तो क्या वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में आती है? इसी सवाल से जुड़े एक मामले में त्रिपुरा हाईकोर्ट ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अन्य के खिलाफ कथित आपत्तिजनक टिप्पणियों से जुड़े मामलों को रद्द करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि राजनीतिक असहमति और आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन सोशल मीडिया पर इस्तेमाल की गई कथित अपमानजनक या मानहानिकारक भाषा को हर स्थिति में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का संरक्षण नहीं दिया जा सकता।
प्रधानमंत्री और मेयर पर कथित आपत्तिजनक टिप्पणी
यह मामला कंटेंट क्रिएटर माधबी बिस्वास चक्रवर्ती की ओर से दाखिल दो याचिकाओं से जुड़ा था। उन्होंने ईस्ट अगरतला और वेस्ट अगरतला थानों में दर्ज FIR और बाद में दाखिल चार्जशीट को रद्द करने की मांग की थी। पुलिस की शिकायतों में प्रधानमंत्री के खिलाफ कथित आपत्तिजनक भाषा के इस्तेमाल के अलावा अगरतला के मेयर को लेकर भी कथित विवादित टिप्पणी का उल्लेख किया गया था।
कोर्ट ने कहा- आलोचना और अपमान में अंतर
अदालत के सामने याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि उनके बयान राजनीतिक विचार और व्यक्तिगत राय थे तथा उन्हें संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का संरक्षण प्राप्त है। वहीं, राज्य की ओर से आरोपों को प्रथम दृष्टया गंभीर बताते हुए कहा गया कि टिप्पणियों से संबंधित व्यक्तियों की प्रतिष्ठा और लोगों की भावनाओं पर असर पड़ा।
सोशल मीडिया पोस्ट भी कानूनी जांच के दायरे में
हाईकोर्ट ने FIR में लगाए गए आरोपों को देखते हुए यह मानने से इनकार किया कि मामले को शुरुआती स्तर पर ही समाप्त कर दिया जाए। अदालत की टिप्पणी का व्यापक संदेश यह है कि सोशल मीडिया पर पोस्ट की गई सामग्री भी कानून से बाहर नहीं है। किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति की नीतियों या कार्यों की आलोचना करना अलग बात है, जबकि कथित तौर पर मानहानिकारक या अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल अलग कानूनी सवाल खड़ा कर सकता है।
गिरफ्तारी के बाद मिली थी जमानत
मामले में माधबी बिस्वास चक्रवर्ती को गिरफ्तार किया गया था। बाद में उन्हें अंतरिम जमानत मिली और पुलिस जांच पूरी होने के बाद चार्जशीट दाखिल की गई। इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर FIR और चार्जशीट को चुनौती दी। हालांकि अदालत ने इस स्तर पर आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने से इनकार कर दिया।
अभिव्यक्ति की आजादी बनाम कानूनी जिम्मेदारी
इस मामले से एक बार फिर यह बहस सामने आई है कि सोशल मीडिया पर राजनीतिक टिप्पणी करते समय अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमा कहां तक है। लोकतंत्र में सरकार और नेताओं की आलोचना महत्वपूर्ण है, लेकिन अदालत ने यह संकेत दिया है कि स्वतंत्र अभिव्यक्ति का दावा कथित मानहानिकारक या आपत्तिजनक सामग्री के खिलाफ कानूनी जांच को स्वतः खत्म नहीं करता।