डूंगरपुर में किसानों-मजदूरों और छात्रों का जेल भरो आंदोलन, सैकड़ों ने दी गिरफ्तारी
खबर का सारांश
डूंगरपुर में सोमवार को किसानों, मजदूरों, छात्रों, महिला कर्मियों और आदिवासी समाज से जुड़े लोगों ने विभिन्न जनमुद्दों को लेकर जेल भरो आंदोलन किया। अखिल भारतीय किसान सभा, सीटू समेत कई संगठनों के संयुक्त आह्वान पर आयोजित प्रदर्शन में बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए। प्रदर्शनकारियों ने वनाधिकार पट्टे, भूमि अधिकार, रोजगार, शिक्षा, किसान समस्याओं और महिला कर्मियों से जुड़े मुद्दों को लेकर सरकार के खिलाफ आवाज उठाई। बादल महल रोड से शुरू हुई रैली जिला मुख्यालय पहुंची, जहां जमकर नारेबाजी हुई। प्रदर्शन के बाद बड़ी संख्या में आंदोलनकारियों ने सामूहिक गिरफ्तारी दी और मांगों पर जल्द कार्रवाई नहीं होने पर आंदोलन को और व्यापक करने की चेतावनी दी।
बादल महल रोड से शुरू हुआ प्रदर्शन
जेल भरो आंदोलन की शुरुआत डूंगरपुर के बादल महल रोड से हुई। यहां किसान, मजदूर, विद्यार्थी, महिला कर्मी और विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़े लोग बैनर और तख्तियां लेकर एकत्र हुए। प्रदर्शनकारी रैली के रूप में जिला मुख्यालय पहुंचे। रास्ते में सरकार के खिलाफ नारेबाजी करते हुए उन्होंने अपनी मांगों को प्रमुखता से उठाया। जिला मुख्यालय पहुंचने के बाद प्रदर्शनकारियों ने विभिन्न जनसमस्याओं पर सरकार का ध्यान आकर्षित किया। आंदोलन में शामिल संगठनों ने कहा कि लंबे समय से कई मांगें लंबित हैं और इन्हें लेकर लगातार सरकार से कार्रवाई की मांग की जा रही है।
वनाधिकार और भूमि अधिकार का मुद्दा प्रमुख
आंदोलन में आदिवासी और किसान परिवारों से जुड़े भूमि अधिकार के मुद्दे को प्रमुखता से उठाया गया। प्रदर्शनकारियों ने वनाधिकार अधिनियम 2006 के तहत पात्र परिवारों को वनाधिकार पट्टे जारी करने की मांग की। उनका कहना था कि कई परिवार लंबे समय से वन भूमि पर अपने अधिकार के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इसके साथ ही ऐसी जमीन पर वर्षों से काबिज पात्र और जरूरतमंद परिवारों को खातेदारी अधिकार देने की मांग भी रखी गई। आंदोलनकारियों का कहना है कि भूमि अधिकार मिलने से गरीब और आदिवासी परिवारों को स्थायी सुरक्षा मिलेगी तथा उनकी आजीविका से जुड़ी अनिश्चितता कम होगी।
छात्रों ने परीक्षा नियमों में बदलाव की मांग उठाई
प्रदर्शन में छात्र संगठनों ने भी अपनी मांगों को प्रमुखता से रखा। एसएफआई और डीवाईएफआई से जुड़े विद्यार्थियों ने प्रतियोगी एवं पात्रता परीक्षाओं में 40 प्रतिशत न्यूनतम अंकों की बाध्यता खत्म करने की मांग की। छात्र नेताओं का तर्क है कि टीएसपी और आदिवासी क्षेत्रों के विद्यार्थियों को शिक्षा एवं रोजगार के क्षेत्र में पहले से कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में अतिरिक्त न्यूनतम अंक की बाध्यता उनके अवसरों को प्रभावित कर सकती है। छात्रों ने राजस्थान के विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में छात्रसंघ चुनाव फिर से शुरू कराने की मांग भी आंदोलन के दौरान उठाई।
आशा और आंगनवाड़ी कर्मियों ने भी रखी मांगें
जेल भरो आंदोलन में आशा सहयोगिनियों, आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं ने भी हिस्सा लिया। महिला कर्मियों ने मानदेय बढ़ाने, लंबित भुगतान जारी करने और सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी सुविधाएं उपलब्ध कराने की मांग की। प्रदर्शनकारियों ने कहा कि ग्रामीण और दूरदराज क्षेत्रों में इन महिला कर्मियों की महत्वपूर्ण भूमिका है, लेकिन उनकी समस्याओं का लंबे समय से समाधान नहीं हुआ है। आंदोलन के दौरान महिला कर्मियों ने सरकार से उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार करने और जल्द निर्णय लेने की अपील की।
किसानों ने पानी और बिजली की समस्या उठाई
किसानों ने कृषि से जुड़े कई मुद्दों को भी प्रदर्शन का हिस्सा बनाया। आंदोलनकारियों ने मेवाड़ डेम की नहरों में पर्याप्त पानी छोड़े जाने की मांग की। इसके अलावा कृषि कार्य के लिए नियमित बिजली उपलब्ध कराने और स्मार्ट मीटर लगाने की प्रक्रिया पर पुनर्विचार करने की मांग भी उठाई गई। किसानों का कहना था कि सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी और निर्बाध बिजली उपलब्ध नहीं होने से खेती प्रभावित होती है। ऐसे में सरकार को ग्रामीण क्षेत्रों की वास्तविक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए किसानों की समस्याओं का समाधान करना चाहिए।
सामूहिक गिरफ्तारी देकर दी आंदोलन तेज करने की चेतावनी
प्रदर्शन के अंतिम चरण में किसानों, मजदूरों, छात्रों, महिलाओं और विभिन्न संगठनों से जुड़े बड़ी संख्या में लोगों ने सामूहिक गिरफ्तारी दी। आंदोलनकारियों ने कहा कि उनका प्रदर्शन विभिन्न जनमुद्दों को सरकार तक पहुंचाने के लिए किया गया है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि उनकी मांगों पर जल्द ठोस कार्रवाई नहीं हुई तो आंदोलन को गांवों और तहसील स्तर तक विस्तार दिया जाएगा। फिलहाल प्रदर्शन के बाद प्रशासन और सरकार के अगले कदम पर आंदोलनकारियों की नजर है। मांगों को लेकर आगे की रणनीति भी संबंधित संगठनों की ओर से तय की जा सकती है।