तमिलनाडु में ‘वंदे मातरम’ विवाद से सियासी संग्राम, मंत्री ने कार्यक्रम का किया बहिष्कार
तमिलनाडु में एक विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह के दौरान ‘वंदे मातरम’, राष्ट्रगान और राज्य गीत के क्रम को लेकर नया राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। कार्यक्रम में राज्य गीत ‘तमिल ताई वाझथु’ से पहले ‘वंदे मातरम’ बजाए जाने पर राज्य सरकार के उच्च शिक्षा मंत्री पी. विश्वनाथन ने नाराजगी जताते हुए समारोह छोड़ दिया। घटना के बाद राज्य सरकार, राजभवन और भाजपा के बीच तीखी राजनीतिक बयानबाजी शुरू हो गई है।
दीक्षांत समारोह में प्रोटोकॉल बना विवाद की वजह
विवाद मनोनमनियम सुंदरनार विश्वविद्यालय के 33वें दीक्षांत समारोह से जुड़ा है, जहां राज्यपाल राजेंद्र अर्लेकर मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद थे। कार्यक्रम की शुरुआत ‘वंदे मातरम’ से हुई, इसके बाद राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ और अंत में तमिलनाडु का राज्य गीत ‘तमिल ताई वाझथु’ प्रस्तुत किया गया। राज्य में लंबे समय से सार्वजनिक कार्यक्रमों की शुरुआत राज्य गीत से करने की परंपरा रही है। इसी बदलाव को लेकर समारोह के दौरान राजनीतिक असहमति सामने आई और मामला सुर्खियों में आ गया।
राज्य गीत के सम्मान का हवाला देकर मंत्री ने किया वॉकआउट
उच्च शिक्षा मंत्री पी. विश्वनाथन ने राज्य गीत को प्राथमिकता नहीं दिए जाने पर कार्यक्रम का बहिष्कार कर दिया। उनके साथ कुछ स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने भी समारोह में हिस्सा नहीं लिया। मंत्री का कहना है कि उनका कदम तमिल भाषा, संस्कृति और राज्य की परंपराओं के सम्मान की रक्षा के लिए उठाया गया। उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि तमिलनाडु की सांस्कृतिक पहचान से जुड़े मुद्दों पर किसी तरह का समझौता स्वीकार नहीं किया जा सकता।
केंद्र के परामर्श और राज्य की परंपरा के बीच टकराव
विवाद की एक बड़ी वजह केंद्र सरकार की ओर से जारी वह परामर्श भी माना जा रहा है, जिसमें ‘वंदे मातरम’ की 150वीं वर्षगांठ के अवसर पर संवैधानिक पदाधिकारियों की मौजूदगी वाले कार्यक्रमों में इसे प्रमुखता देने की बात कही गई है। दूसरी ओर, तमिलनाडु में वर्षों से सरकारी आयोजनों की शुरुआत ‘तमिल ताई वाझथु’ से करने की परंपरा चली आ रही है। इसी अलग-अलग व्यवस्था के कारण कार्यक्रम में प्रोटोकॉल को लेकर विवाद खड़ा हो गया।
भाजपा ने मंत्री के फैसले पर जताई आपत्ति
भाजपा ने मंत्री के कार्यक्रम छोड़ने के फैसले की आलोचना की है। पार्टी नेताओं का कहना है कि संवैधानिक पदों की गरिमा और केंद्र सरकार के दिशा-निर्देशों का सम्मान किया जाना चाहिए। भाजपा का आरोप है कि इस मुद्दे को अनावश्यक रूप से राजनीतिक रंग दिया जा रहा है, जबकि सरकार को शिक्षा व्यवस्था और विश्वविद्यालयों के विकास जैसे अहम विषयों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
राजनीतिक बयानबाजी से और गरमाया माहौल
इस घटनाक्रम के बाद राज्य की राजनीति में नई बहस शुरू हो गई है। सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने तमिल भाषा और सांस्कृतिक पहचान के सम्मान को सर्वोच्च बताया, जबकि विपक्षी दलों ने भी इस मुद्दे पर अपनी-अपनी प्रतिक्रियाएं दी हैं। फिलहाल विवाद केवल एक कार्यक्रम तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह राज्य की सांस्कृतिक परंपरा, संवैधानिक प्रोटोकॉल और राजनीतिक दृष्टिकोण के बीच टकराव का नया विषय बन गया है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी और तेज होने की संभावना जताई जा रही है।
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