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1971 की जनगणना आधारित परिसीमन पर रोक को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई से सुप्रीम कोर्ट का इनकार

सुप्रीम कोर्ट ने लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों के परिसीमन में 1971 एवं 2001 की जनगणना के आंकड़ों के इस्तेमाल से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों को चुनौती देने वाली जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। अदालत ने याचिकाकर्ता को सलाह दी कि वह पहले अपनी मांग संबंधित अधिकारियों और विधायिका के समक्ष रखे। इसके बाद याचिकाकर्ता ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया।

परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधनों को दी गई थी चुनौती

याचिका में 84वें और 87वें संविधान संशोधन अधिनियमों की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाया गया था। साथ ही संविधान के अनुच्छेद 55, 81, 82, 170, 330 और 332 के उन प्रावधानों को भी चुनौती दी गई थी, जिनके तहत परिसीमन के लिए 1971 और बाद में 2001 की जनगणना के आंकड़ों का उपयोग जारी रखा गया। याचिकाकर्ता का कहना था कि मौजूदा जनसंख्या के बजाय पुराने आंकड़ों पर आधारित प्रतिनिधित्व लोकतांत्रिक सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है और इससे समान प्रतिनिधित्व का अधिकार प्रभावित होता है।

याचिकाकर्ता ने जनसंख्या बदलाव का दिया हवाला

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने स्वयं अदालत के सामने पक्ष रखते हुए तर्क दिया कि भारत जैसे प्रतिनिधि लोकतंत्र में राजनीतिक प्रतिनिधित्व नवीनतम जनसंख्या के आधार पर तय होना चाहिए। उनका कहना था कि 1971 के बाद देश की आबादी में बड़ा बदलाव आया है, लेकिन सीटों का बंटवारा पुराने आधार पर बना हुआ है। उन्होंने नोएडा, गुरुग्राम और मोहाली जैसे तेजी से विकसित हुए शहरी क्षेत्रों का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां जनसंख्या बढ़ने के बावजूद संसदीय प्रतिनिधित्व में अपेक्षित बदलाव नहीं हुआ, जिससे अधिक आबादी वाले निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाताओं का प्रतिनिधित्व प्रभावित हो रहा है।

सुप्रीम कोर्ट ने उठाए कानूनी आधार पर सवाल

मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने याचिका के कानूनी आधार पर सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि मतदान का अधिकार और परिसीमन दो अलग-अलग विषय हैं तथा किसी निर्वाचन क्षेत्र की सीमा बदलने से किसी नागरिक का मतदान का अधिकार समाप्त नहीं होता। पीठ ने यह भी कहा कि संवैधानिक व्यवस्था राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व का संतुलन बनाए रखने का प्रयास करती है। न्यायालय के अनुसार, उठाए गए मुद्दे नीतिगत प्रकृति के हैं, जिन पर संबंधित प्राधिकरण और विधायिका विचार कर सकते हैं।

84वें और 87वें संशोधन का क्या है प्रावधान

84वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2001 के तहत राज्यों के बीच लोकसभा और विधानसभा सीटों के बंटवारे पर 1971 की जनगणना के आधार पर लगी रोक को 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना तक बढ़ा दिया गया था। इसके बाद 87वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 के जरिए 1991 की जनगणना के स्थान पर 2001 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण करने का प्रावधान किया गया, जबकि राज्यों के बीच सीटों की संख्या में कोई बदलाव नहीं किया गया।

अधिकारियों के समक्ष रखने की सलाह, याचिका वापस

सुनवाई के अंत में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह फिलहाल इस याचिका पर विचार करने के पक्ष में नहीं है। अदालत ने याचिकाकर्ता को सुझाव दिया कि वह पहले संबंधित अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के समक्ष अपनी मांग रखे, ताकि यदि आवश्यक हो तो इस विषय पर नीतिगत स्तर पर विचार किया जा सके। इसके बाद याचिकाकर्ता ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया। अदालत ने याचिका को खारिज करने के बजाय वापस लेने की अनुमति देते हुए कार्यवाही समाप्त कर दी।

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