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अलवर पौधारोपण घोटाला: हाईकोर्ट ने सरकार से 4 हफ्ते में जवाब मांगा

हाईकोर्ट सख्त, राज्य सरकार को नोटिस जारी

राजस्थान हाई कोर्ट ने अलवर के राजगढ़ रेंज में सामने आए कथित पौधारोपण घोटाले को गंभीरता से लेते हुए राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने चार सप्ताह के भीतर विस्तृत जवाब पेश करने के निर्देश दिए हैं। मामला पर्यावरण संरक्षण के नाम पर हुए कथित 17.5 करोड़ रुपये के वित्तीय घोटाले से जुड़ा है, जिसमें अंतरराष्ट्रीय और सरकारी फंड के दुरुपयोग के आरोप लगाए गए हैं। अदालत ने जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए पूरे मामले में पारदर्शिता सुनिश्चित करने पर जोर दिया है।

जेसीबी से काम, कागजों में मजदूरों का रिकॉर्ड

याचिका में सबसे गंभीर आरोप यह है कि पौधारोपण और गड्ढे खोदने जैसे कार्यों में भारी मशीनों, खासकर जेसीबी का उपयोग किया गया। जबकि सरकारी दस्तावेजों और मस्टर रोल में इसे मजदूरों द्वारा किया गया मैन्युअल कार्य दिखाया गया। आरोप है कि कागजों में मजदूरों का पसीना बहता दिखाकर वास्तविक मशीन कार्य को छिपाया गया। इस कथित हेरफेर ने पूरे प्रोजेक्ट की पारदर्शिता और वित्तीय ईमानदारी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसकी जांच की मांग कोर्ट में की गई है।

17.5 करोड़ रुपये की अनियमितता का आरोप

याचिका के अनुसार यह पूरा मामला लगभग 17.5 करोड़ रुपये की वित्तीय अनियमितताओं से जुड़ा है। इसमें आरोप लगाया गया है कि करीब 2 करोड़ रुपये का सीधा गबन किया गया, जबकि 15.5 करोड़ रुपये से अधिक की राशि संदिग्ध तरीके से विभिन्न समितियों के खातों से निकाली गई। यह फंड ‘कैम्पा’, राज्य वानिकी परियोजना और अंतरराष्ट्रीय ऋण के माध्यम से आया था। आरोप है कि फर्जी दस्तावेजों और गलत भुगतान के जरिए पूरी राशि का दुरुपयोग किया गया।

आंतरिक रिपोर्ट में भी गड़बड़ी के संकेत

मामले की खास बात यह है कि आरोपों के समर्थन में याचिकाकर्ता ने बाहरी जांच नहीं, बल्कि वन विभाग की आंतरिक रिपोर्ट को ही आधार बनाया है। रिपोर्ट में तत्कालीन मुख्य वन संरक्षक द्वारा अनियमितताओं की आशंका जताई गई थी। इसके बाद विभागीय स्तर पर जांच कराई गई, जिसमें वित्तीय गड़बड़ियों और रिकॉर्ड में हेरफेर के संकेत मिले। यह रिपोर्ट ही अब अदालत में मामले का अहम आधार बनी हुई है।

पर्यावरण को नुकसान का भी गंभीर आरोप

याचिका में यह भी दावा किया गया है कि पौधारोपण कार्य ऐसे क्षेत्रों में किया गया जो भौगोलिक रूप से अनुपयुक्त थे। भारी मशीनों के इस्तेमाल से वन भूमि की प्राकृतिक संरचना और मिट्टी को नुकसान पहुंचा है। आरोप है कि इससे पर्यावरण संरक्षण के बजाय पारिस्थितिकी को क्षति हुई है। अब सभी की नजरें राज्य सरकार के जवाब पर टिकी हैं, जो अगले चार सप्ताह में अदालत में पेश किया जाएगा।

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