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अमेरिका-ईरान समझौते से क्यों असहज हैं नेतन्याहू? जानिए पांच बड़ी वजहें

अमेरिका और ईरान के बीच हुए युद्धविराम समझौते ने पश्चिम एशिया की राजनीति में नया मोड़ ला दिया है। हालांकि इस समझौते को क्षेत्रीय स्थिरता की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है, लेकिन इजरायल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू इसके प्रति सहज नहीं दिख रहे हैं। राजनीतिक दबाव, सुरक्षा चिंताएं और ईरान की बढ़ती संभावित ताकत जैसे कई कारण उनके लिए नई चुनौतियां खड़ी कर रहे हैं।

ट्रंप और नेतन्याहू के बीच मतभेद आए खुलकर सामने

इजरायली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने स्पष्ट कहा है कि वह और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप हर मुद्दे पर एक जैसी सोच नहीं रखते। उन्होंने दोहराया कि इजरायल अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार फैसले करेगा। यह बयान ऐसे समय आया है, जब अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौते में लेबनान समेत सभी मोर्चों पर सैन्य गतिविधियां रोकने की बात कही गई है। इसके बावजूद दक्षिणी लेबनान में इजरायली कार्रवाई जारी रहने से दोनों देशों के बीच रणनीतिक मतभेद उजागर हुए हैं।

समझौते से कमजोर हुई नेतन्याहू की राजनीतिक स्थिति

अमेरिका-ईरान समझौते को नेतन्याहू के लिए राजनीतिक झटका माना जा रहा है। लंबे समय से वह खुद को अमेरिका का सबसे करीबी सहयोगी और प्रभावशाली नेता बताते रहे हैं, लेकिन इस समझौते में इजरायल की भूमिका सीमित दिखाई दी। इससे विपक्ष और उनकी अपनी पार्टी के भीतर भी सवाल उठने लगे हैं। कट्टरपंथी सहयोगी दलों के नेताओं ने भी सार्वजनिक रूप से इस समझौते पर असहमति जताई है, जिससे नेतन्याहू पर घरेलू दबाव और बढ़ गया है।

सुरक्षा नीति और ईरान को लेकर खड़ी हुई नई दुविधा

नेतन्याहू लगातार ईरान को इजरायल की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बताते रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में उन्होंने आक्रामक सुरक्षा नीति अपनाते हुए क्षेत्रीय खतरों को खत्म करने की रणनीति पर जोर दिया था। लेकिन युद्धविराम के बाद ईरान पूरी तरह कमजोर नहीं हुआ है और कई विश्लेषकों का मानना है कि वहां कट्टरपंथी धड़े और मजबूत होकर उभरे हैं। ऐसे में नेतन्याहू के सामने यह चुनौती है कि वह अपनी सुरक्षा नीति को कैसे सही साबित करें।

चुनाव और भ्रष्टाचार मामलों के बीच बढ़ा दबाव

इजरायल में आगामी चुनावों से पहले नेतन्याहू पहले से ही कई राजनीतिक और कानूनी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। उन पर रिश्वतखोरी, धोखाधड़ी और विश्वासघात से जुड़े मामलों में आरोप लगे हुए हैं, हालांकि उन्होंने इन सभी आरोपों से इनकार किया है। ऐसे माहौल में यदि ईरान समझौते के बाद मजबूत स्थिति में दिखाई देता है, तो विपक्ष इसे चुनावी मुद्दा बना सकता है। इससे नेतन्याहू की ‘मिस्टर सिक्योरिटी’ वाली छवि को नुकसान पहुंचने का खतरा है।

परमाणु कार्यक्रम और आर्थिक राहत बना चिंता का कारण

ईरान का परमाणु कार्यक्रम अब भी अमेरिका और इजरायल के लिए सबसे संवेदनशील मुद्दों में शामिल है। हालांकि ईरान ने परमाणु हथियार नहीं बनाने की बात दोहराई है, लेकिन संवर्धित यूरेनियम के मौजूदा भंडार जैसे कई अहम मुद्दे अभी भी लंबित हैं। दूसरी ओर, संभावित आर्थिक राहत और तेल निर्यात में मिलने वाली छूट से ईरान की आर्थिक स्थिति मजबूत हो सकती है। विश्लेषकों का मानना है कि इससे क्षेत्रीय शक्ति संतुलन पर भी असर पड़ सकता है, जो इजरायल के लिए चिंता का विषय है।

लेबनान और हिज्बुल्लाह को लेकर बनी हुई है अनिश्चितता

अमेरिका और ईरान दोनों चाहते हैं कि लेबनान में संघर्ष समाप्त हो और सभी पक्ष युद्धविराम का पालन करें। लेकिन इजरायल का कहना है कि वह अपनी सुरक्षा सुनिश्चित होने तक दक्षिणी लेबनान में मौजूद रहेगा। यदि इजरायल पीछे हटता है, तो नेतन्याहू को घरेलू स्तर पर आलोचना का सामना करना पड़ सकता है। वहीं यदि सैन्य कार्रवाई जारी रहती है, तो इससे अमेरिका के साथ मतभेद और गहरे हो सकते हैं।

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