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इन तीन बड़ी वजहों से पटरी से उतर सकता है अमेरिका-ईरान समझौता

अमेरिका और ईरान के बीच हुए प्रारंभिक समझौते को पश्चिम एशिया में तनाव कम करने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि यह अभी अंतिम समाधान नहीं, बल्कि आगे की बातचीत का एक ढांचा भर है। लेबनान विवाद, ईरान के परमाणु कार्यक्रम और होर्मुज स्ट्रेट के संचालन को लेकर मतभेद ऐसे तीन बड़े मुद्दे हैं, जो इस समझौते की राह में बाधा बन सकते हैं।

शुरुआती सहमति के बाद भी कई चुनौतियां बरकरार

अमेरिका और ईरान के बीच हुए सहमति-पत्र (MoU) को क्षेत्रीय तनाव कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस समझौते में युद्धविराम, आर्थिक सहयोग, परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत और होर्मुज स्ट्रेट में आवाजाही बहाल करने जैसे बिंदु शामिल हैं। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि अभी कई अहम मुद्दों पर स्पष्ट सहमति नहीं बन पाई है और यही कारण है कि आने वाले दिनों में बातचीत का दौर काफी चुनौतीपूर्ण रहने वाला है।

पहली चुनौती: लेबनान को लेकर अलग-अलग रुख

लेबनान का मुद्दा समझौते के लिए सबसे संवेदनशील विषयों में से एक बनकर उभरा है। ईरान और उसके समर्थक संगठन चाहते हैं कि लेबनान में सैन्य गतिविधियां पूरी तरह समाप्त हों और विदेशी सैनिकों की वापसी सुनिश्चित की जाए। दूसरी ओर, इजरायल सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए अपनी सैन्य मौजूदगी बनाए रखने की बात कर रहा है। इस मुद्दे पर मतभेद बढ़ने की स्थिति में क्षेत्रीय तनाव फिर से बढ़ सकता है और शांति प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।

दूसरी चुनौती: परमाणु कार्यक्रम पर अविश्वास

ईरान का परमाणु कार्यक्रम वर्षों से अमेरिका और पश्चिमी देशों के लिए चिंता का विषय रहा है। समझौते के तहत ईरान ने परमाणु हथियार विकसित नहीं करने की प्रतिबद्धता जताई है, लेकिन संवर्धित यूरेनियम के मौजूदा भंडार और भविष्य की निगरानी व्यवस्था को लेकर कई सवाल अब भी बाकी हैं। यदि दोनों पक्ष इस मुद्दे पर साझा समाधान तक नहीं पहुंच पाते, तो प्रतिबंधों और सैन्य तनाव की स्थिति दोबारा पैदा हो सकती है।

तीसरी चुनौती: होर्मुज स्ट्रेट के संचालन पर मतभेद

दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण होर्मुज स्ट्रेट को दोबारा खोलने की योजना समझौते का अहम हिस्सा है। हालांकि इसके संचालन, सुरक्षा व्यवस्था और संभावित शुल्क प्रणाली को लेकर अमेरिका और ईरान की सोच अलग दिखाई दे रही है। ईरान इस समुद्री मार्ग के प्रबंधन में बड़ी भूमिका चाहता है, जबकि अमेरिका और खाड़ी देश निर्बाध और बिना अतिरिक्त शुल्क के आवागमन के पक्षधर हैं। यही मतभेद भविष्य में विवाद का कारण बन सकते हैं।

विशेषज्ञ बोले- असली परीक्षा अभी बाकी

अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का मानना है कि मौजूदा समझौता केवल आगे की बातचीत का आधार है, न कि अंतिम समाधान। अगले कुछ सप्ताह और महीनों में दोनों देशों को कई जटिल मुद्दों पर सहमति बनानी होगी। यदि किसी भी मोर्चे पर तनाव बढ़ता है, तो पूरी प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। इसलिए इस समझौते की सफलता अब भविष्य की वार्ताओं और दोनों पक्षों के राजनीतिक संकल्प पर निर्भर करेगी।

वैश्विक बाजार और क्षेत्रीय स्थिरता पर रहेगी नजर

अमेरिका और ईरान के बीच किसी भी सकारात्मक प्रगति का असर वैश्विक ऊर्जा बाजार, तेल की कीमतों और पश्चिम एशिया की सुरक्षा स्थिति पर पड़ेगा। दुनिया की निगाहें अब इस बात पर टिकी हैं कि दोनों देश अपने मतभेदों को बातचीत के जरिए सुलझाने में कितने सफल होते हैं और क्या यह समझौता लंबे समय तक टिकाऊ साबित हो पाता है।

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