सरिस्का में अटका विस्थापन, 200 परिवार जंगल छोड़ने को तैयार लेकिन जमीन नहीं
अलवर के सरिस्का टाइगर रिजर्व में बाघों की बढ़ती संख्या के बीच मानव-बाघ संघर्ष की चुनौती लगातार गहराती जा रही है। जंगल के भीतर बसे करीब 200 परिवार वर्षों से विस्थापन का इंतजार कर रहे हैं और दूसरी जगह बसने के लिए तैयार भी हैं, लेकिन जमीन उपलब्ध नहीं होने के कारण प्रक्रिया अटक गई है। नतीजतन ग्रामीण भय के माहौल में जीवन बिता रहे हैं, जबकि बाघों के लिए भी पर्याप्त क्षेत्र उपलब्ध नहीं हो पा रहा।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद धीमी पड़ी प्रक्रिया
सरिस्का टाइगर रिजर्व से गांवों के विस्थापन को लेकर सुप्रीम कोर्ट समय-समय पर जोर देता रहा है, लेकिन जमीनी स्तर पर प्रक्रिया अपेक्षित गति नहीं पकड़ पा रही। प्रशासन ने कई गांवों के लोगों को जंगल से बाहर बसाने की योजना बनाई, मगर भूमि आवंटन की जटिलताओं के कारण काम अधूरा रह गया। इससे न केवल ग्रामीणों की परेशानियां बढ़ी हैं, बल्कि वन्यजीव संरक्षण की योजनाओं पर भी असर पड़ रहा है। विस्थापन की धीमी रफ्तार अब सरिस्का प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती बन चुकी है।
देवरी गांव के 125 परिवारों का इंतजार जारी
देवरी गांव के विस्थापन के लिए प्रशासन ने करीब छह माह पहले लक्ष्मणगढ़ क्षेत्र में जमीन चिन्हित की थी। जांच के दौरान पता चला कि वह भूमि वन विभाग के अधिकार क्षेत्र में आती है, जिसके कारण उसे सीधे विस्थापन के लिए उपयोग नहीं किया जा सकता। भूमि डायवर्जन का प्रस्ताव सरकार को भेजा गया, लेकिन अब तक मंजूरी नहीं मिल सकी। परिणामस्वरूप देवरी गांव के लगभग 125 परिवार जंगल से बाहर बसने के लिए तैयार होने के बावजूद वहीं रहने को मजबूर हैं। ग्रामीणों का कहना है कि वे सुरक्षित स्थान पर जाना चाहते हैं, लेकिन प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ रही।
हरिपुरा के लोग भी नई बसावट की राह देख रहे
हरिपुरा गांव के निवासियों को भी लंबे प्रयासों के बाद विस्थापन के लिए राजी किया गया था। प्रशासन ने उन्हें दूसरी जगह बसाने की योजना बनाई, लेकिन उपयुक्त भूमि उपलब्ध नहीं होने से मामला अटक गया। तिजारा क्षेत्र में जमीन उपलब्ध होने के बावजूद अधिकांश ग्रामीण वहां बसने को तैयार नहीं हैं। उनकी प्राथमिकता थानागाजी क्षेत्र है, जहां वे अपने सामाजिक और आर्थिक संबंधों के कारण बसना चाहते हैं। प्रशासन ने थानागाजी में भूमि उपलब्ध कराने के लिए कई स्तरों पर पत्राचार किया, लेकिन अब तक कोई ठोस समाधान नहीं निकल पाया है।
डेरा गांव के विस्थापन की प्रक्रिया आगे बढ़ी
सरिस्का क्षेत्र के डेरा गांव के लोगों ने तिजारा में बसने की सहमति दे दी है। इसके बाद प्रशासन ने इस गांव के विस्थापन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया है। सरिस्का में कुल 29 गांव बसे हुए हैं, जिनमें से कई गांवों का आंशिक या पूर्ण विस्थापन किया जा चुका है। पहले चरण में भगानी, रोट क्याला, उमरी, बाबली और पानी ढाल जैसे गांवों को हटाया गया, जिससे करीब 200 हेक्टेयर क्षेत्र वन्यजीवों के लिए मुक्त हुआ। अब शेष गांवों को भी चरणबद्ध तरीके से स्थानांतरित करने की योजना पर काम चल रहा है।
बढ़ती बाघ संख्या से टेरेटरी पर बढ़ा दबाव
सरिस्का में बाघों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जो संरक्षण की दृष्टि से सकारात्मक संकेत है। हालांकि इसके साथ ही बाघों के लिए पर्याप्त टेरेटरी उपलब्ध कराना भी जरूरी हो गया है। जंगल के भीतर आबादी होने से बाघ कई बार गांवों के आसपास तक पहुंच जाते हैं। इन क्षेत्रों में उन्हें आसान शिकार और भोजन मिलने की संभावना रहती है, जिससे मानव-बाघ संघर्ष का खतरा बढ़ जाता है। वन विभाग का मानना है कि यदि गांवों का समय पर विस्थापन हो जाए तो बाघों को अधिक प्राकृतिक क्षेत्र मिलेगा और ग्रामीणों की सुरक्षा भी सुनिश्चित हो सकेगी।