भारत-रूस सैन्य समझौते में क्या है खास? क्या भारत में तैनात होंगे 3,000 रूसी सैनिक
भारत और रूस के बीच लंबे समय से प्रस्तावित सैन्य लॉजिस्टिक सहयोग समझौता अब लागू हो चुका है। इस समझौते को लेकर सोशल मीडिया पर दोनों देशों में 3,000-3,000 सैनिकों की तैनाती जैसे दावे किए जा रहे हैं, लेकिन रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थायी सैन्य तैनाती का समझौता नहीं, बल्कि आपसी लॉजिस्टिक सहायता और सैन्य सहयोग को आसान बनाने वाला प्रावधान है।
RELOS समझौते से बढ़ेगा रक्षा सहयोग
भारत और रूस के बीच हुआ रेसिप्रोकल एक्सचेंज ऑफ लॉजिस्टिक्स एग्रीमेंट (RELOS) दोनों देशों की सेनाओं के बीच सहयोग को और मजबूत करेगा। इस व्यवस्था के तहत दोनों देश जरूरत पड़ने पर एक-दूसरे के सैन्य ठिकानों, बंदरगाहों और सुविधाओं का उपयोग ईंधन, मरम्मत, सप्लाई और अन्य लॉजिस्टिक सहायता के लिए कर सकेंगे। कई वर्षों की चर्चा के बाद यह समझौता इस वर्ष जनवरी से प्रभावी हो गया है।
क्या सच में तैनात होंगे 3,000 सैनिक?
समझौते के बाद कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया कि भारत और रूस एक-दूसरे के यहां 3,000 सैनिक तैनात कर सकेंगे। हालांकि रक्षा मामलों के जानकारों के अनुसार यह संख्या स्थायी तैनाती का संकेत नहीं है। यह केवल संयुक्त अभ्यास, जहाजों की आवाजाही, विमानों और सैन्य गतिविधियों के दौरान अधिकतम सीमा के रूप में निर्धारित की गई है। किसी भी गतिविधि का आकार दोनों देशों की आपसी सहमति से तय होगा।
सैन्य अड्डा बनाने का नहीं है प्रावधान
विशेषज्ञों का कहना है कि RELOS का उद्देश्य किसी देश में सैन्य अड्डा स्थापित करना नहीं है। इससे पहले भारत-अमेरिका के बीच हुए LEMOA समझौते को लेकर भी सरकार स्पष्ट कर चुकी है कि ऐसे समझौते केवल लॉजिस्टिक सहयोग के लिए होते हैं। इनमें भोजन, ईंधन, चिकित्सा सुविधा, परिवहन, मरम्मत, स्टोरेज और संचार सेवाएं जैसी व्यवस्थाएं शामिल होती हैं।
कई देशों के साथ पहले से ऐसे समझौते कर चुका है भारत
भारत पहले ही अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन, जापान, ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर और वियतनाम जैसे देशों के साथ इसी तरह के लॉजिस्टिक समझौते कर चुका है। वर्ष 2020 में पूर्वी लद्दाख में चीन के साथ तनाव के दौरान भारत ने इसी तरह के सहयोग का उपयोग करते हुए अपने जवानों के लिए विशेष सर्दियों के उपकरण मंगाए थे। इससे सैन्य जरूरतों को तेजी से पूरा करने में मदद मिली थी।
युद्धपोत और विमान भी कर सकेंगे सुविधाओं का इस्तेमाल
RELOS के तहत दोनों देशों के युद्धपोत एक-दूसरे के बंदरगाहों पर रुक सकेंगे, जबकि सैन्य विमान एयरफील्ड और हवाई क्षेत्र का उपयोग कर सकेंगे। इससे संयुक्त अभ्यास, मानवीय सहायता और आपदा राहत अभियानों में सहयोग और आसान होगा। यह समझौता पांच वर्षों के लिए लागू रहेगा।
आर्कटिक क्षेत्र तक पहुंचेगी भारतीय सेना की पहुंच
भारत-रूस समझौते का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह माना जा रहा है कि भारतीय सैन्य बल जरूरत पड़ने पर रूस के आर्कटिक क्षेत्र में स्थित सैन्य ठिकानों तक भी पहुंच बना सकेंगे। रणनीतिक दृष्टि से यह भारत के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर माना जा रहा है, क्योंकि भविष्य में आर्कटिक क्षेत्र वैश्विक भू-राजनीति और ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से बेहद अहम भूमिका निभा सकता है।