सिंधु जल संधि पर विवाद तेज: “पाकिस्तान ने पानी को हथियार बनाया”, भारतीय विशेषज्ञ का दावा
सिंधु जल संधि (IWT) को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच एक बार फिर तीखी बहस छिड़ गई है। पूर्व भारतीय सिंधु जल आयुक्त पीके सक्सेना के लेख ने पाकिस्तान के आरोपों को खारिज करते हुए दावा किया है कि असल में पानी को राजनीतिक हथियार पाकिस्तान ने बनाया है। वहीं, पाकिस्तान ने इन दावों का खंडन करते हुए संधि को ऐतिहासिक परिस्थितियों का परिणाम बताया है।
सिंधु जल संधि पर फिर टकराव, बयानबाजी से बढ़ा तनाव
सिंधु जल संधि को लेकर दोनों देशों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया है। भारत की ओर से यह तर्क दिया जा रहा है कि पाकिस्तान बार-बार पानी को लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर गलत नैरेटिव पेश करता है। वहीं, भारत ने संधि के बाद पाकिस्तान जाने वाली नदियों पर पनबिजली परियोजनाओं को तेज कर दिया है, जिससे इस मुद्दे पर कूटनीतिक तनाव और बढ़ गया है। पाकिस्तान इन परियोजनाओं को “पानी के हथियारीकरण” के रूप में पेश करता रहा है।
पीके सक्सेना का लेख: “प्रोपेगैंडा फैला रहा है पाकिस्तान”
पूर्व भारतीय सिंधु जल आयुक्त पीके सक्सेना ने अपने लेख में पाकिस्तान के दावों को तथ्यों के साथ खारिज किया है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान लंबे समय से सिंधु जल संधि को गलत तरीके से प्रस्तुत कर रहा है। उनके अनुसार, वास्तविकता यह है कि पानी को लेकर राजनीतिक दबाव बनाने की रणनीति पाकिस्तान ने अपनाई है। सक्सेना का दावा है कि संधि का मूल स्वरूप भारत के लिए कई मायनों में असंतुलित और प्रतिबंधात्मक है, फिर भी भारत ने इसे अब तक निभाया है।
पाकिस्तान का जवाब: संधि ऐतिहासिक मजबूरी का परिणाम
पाकिस्तान के वर्तमान जल आयुक्त सैयद मुहम्मद अली शाह ने पीके सक्सेना के दावों को खारिज किया है। उन्होंने कहा कि यह संधि किसी “उदारता” का परिणाम नहीं थी, बल्कि 1947 के विभाजन और 1948 के जल संकट जैसी गंभीर परिस्थितियों का नतीजा थी। पाकिस्तान का तर्क है कि उसकी कृषि व्यवस्था और जीवनरेखा इसी जल प्रवाह पर निर्भर है, इसलिए यह समझौता उसके लिए अस्तित्व से जुड़ा मुद्दा है।
पानी के बंटवारे पर बहस: अधिकार बनाम प्रतिबंध
दोनों पक्षों की दलीलों में सबसे बड़ा टकराव नदियों के उपयोग अधिकार को लेकर है। भारतीय पक्ष का कहना है कि पाकिस्तान को लगभग 80% जल प्रणाली का लाभ मिलता है, जबकि भारत को 20% हिस्सा मिला है, फिर भी भारत को पश्चिमी नदियों पर सीमित उपयोग की अनुमति है। वहीं पाकिस्तान का तर्क है कि यह सीमाएं “निचली धारा” वाले देश की सुरक्षा के लिए जरूरी हैं और भारत द्वारा बनाए गए प्रोजेक्ट्स पर उसकी आपत्ति का अधिकार वैध है।
पनबिजली परियोजनाओं पर बढ़ा फोकस, रणनीतिक महत्व भी बढ़ा
भारत द्वारा पश्चिमी नदियों पर रन-ऑफ-द-रिवर हाइड्रो प्रोजेक्ट्स को तेजी से आगे बढ़ाने से यह मुद्दा और संवेदनशील बन गया है। पाकिस्तान का आरोप है कि ये परियोजनाएं जल प्रवाह को प्रभावित कर सकती हैं, जबकि भारत का कहना है कि यह संधि के दायरे में पूरी तरह वैध विकास कार्य हैं। इसी वजह से यह विवाद अब सिर्फ जल बंटवारे का नहीं बल्कि रणनीतिक और भू-राजनीतिक मुद्दा भी बन गया है।