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ईरान-कुवैत तनाव: अमेरिकी सैन्य मौजूदगी बनी निशाने की बड़ी वजह, खाड़ी क्षेत्र में बढ़ी नई चिंता

मध्य-पूर्व में बढ़ते संघर्ष के बीच ईरान द्वारा कुवैत को निशाना बनाए जाने को लेकर नई बहस छिड़ गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि कुवैत की रणनीतिक स्थिति और वहां मौजूद अमेरिकी सैन्य अड्डे इस आक्रामकता की प्रमुख वजह बने। लगातार हमलों के बाद अब खाड़ी देशों में सुरक्षा व्यवस्था और अमेरिकी सैन्य साझेदारी की प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं।

अमेरिकी सैन्य अड्डों के कारण बढ़ा खतरा

विश्लेषकों के अनुसार कुवैत में हजारों अमेरिकी सैनिकों की तैनाती और उसकी रणनीतिक स्थिति ने उसे ईरान के लिए संवेदनशील लक्ष्य बना दिया। माना जाता है कि ईरान ने संभावित अमेरिकी सैन्य अभियानों को रोकने के उद्देश्य से दबाव बनाने की रणनीति अपनाई। हालांकि कुवैत ने किसी भी अमेरिकी हमले के लिए अपनी जमीन या हवाई क्षेत्र के इस्तेमाल से इनकार किया है।

हमलों के बाद सुरक्षा मॉडल पर उठे सवाल

हाल के संघर्षों ने खाड़ी देशों की सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था को लेकर नई चर्चा शुरू कर दी है। दशकों से अमेरिकी सैन्य अड्डों को सुरक्षा की गारंटी माना जाता रहा, लेकिन हालिया घटनाओं ने यह धारणा कमजोर की है। विशेषज्ञों का कहना है कि कई बार ये सैन्य ठिकाने सुरक्षा देने के बजाय स्वयं हमलों का लक्ष्य बन जाते हैं।

जीसीसी देशों के सामने नई रणनीतिक चुनौती

खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के सदस्य देशों के बीच सामूहिक रक्षा का विचार पुराना है, लेकिन व्यवहारिक स्तर पर इसका प्रभाव सीमित रहा है। बदलते क्षेत्रीय समीकरणों के बीच अब कुवैत समेत अन्य देशों के सामने यह चुनौती है कि वे अपनी सुरक्षा के लिए किस साझेदारी पर अधिक भरोसा करें। सऊदी अरब के नए रक्षा समझौतों और क्षेत्रीय गठबंधनों ने इस बहस को और तेज कर दिया है।

कुवैत में सांप्रदायिक संतुलन बना रहा मजबूत

विशेषज्ञों का मानना है कि कुवैत के भीतर सुन्नी और शिया समुदायों के बीच लंबे समय से अपेक्षाकृत संतुलित संबंध रहे हैं। 1990 में इराकी हमले के बाद दोनों समुदायों के बीच एकजुटता और मजबूत हुई। आज शिया समुदाय देश की राजनीति और अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है, जिससे आंतरिक अस्थिरता की आशंकाएं अपेक्षाकृत कम रहती हैं।

भविष्य में और बढ़ सकती हैं चुनौतियां

विश्लेषकों का मानना है कि यदि क्षेत्रीय संघर्ष दोबारा तेज होता है तो कुवैत जैसे देशों पर खतरा और बढ़ सकता है। अब बहस केवल सैन्य अड्डों की उपयोगिता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भी देखा जा रहा है कि उनकी मौजूदगी से पैदा होने वाले जोखिम कहीं सुरक्षा लाभों से अधिक तो नहीं हैं।

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