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तृणमूल की ‘टूट’ बीजेपी के लिए बंगाल से ज्यादा दिल्ली में फायदेमंद, लोकसभा में मजबूत होगी सरकार

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के महीने भर के भीतर ही तृणमूल कांग्रेस में भूचाल आ गया है और पार्टी टूट की कगार पर पहुंच गई है। ममता बनर्जी की स्थिति आज उद्धव ठाकरे और शरद पवार जैसी हो गई है, जो अपने ही दल के विद्रोह को देखकर मन मसोस रही हैं। हालांकि, इस संकट का सीधा फायदा बंगाल की राजनीति से ज्यादा दिल्ली की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी को मिलता दिख रहा है। लोकसभा में बीजेपी के लिए विधेयक पारित कराना अब पहले से ज्यादा आसान हो सकता है।

बंगाल चुनाव के बाद ममता के लिए क्यों बना संकट?

पश्चिम बंगाल में हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा चुनावों के नतीजों ने तृणमूल कांग्रेस की कमर तोड़ दी है। माना जा रहा है कि चुनावी परिणामों के बाद पार्टी के भीतर पनप रहा असंतोष अब खुले विद्रोह का रूप ले चुका है। ममता बनर्जी के लिए यह स्थिति बेहद चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि उनके सबसे भरोसेमंद माने जाने वाले नेता और विधायक अब उनके खिलाफ खड़े नजर आ रहे हैं। बंगाल में सत्ता और संगठन दोनों पर पकड़ कमजोर होती दिख रही है, जिससे पार्टी के अस्तित्व पर ही सवालिया निशान लगने लगा है।

दिल्ली में बीजेपी को कैसे मिलेगा राजनीतिक फायदा?

तृणमूल के टूटने का सबसे बड़ा असर पश्चिम बंगाल की सड़कों पर नहीं, बल्कि दिल्ली के संसद भवन में देखने को मिल सकता है। अगर TMC के सांसदों का एक बड़ा गुट अलग होता है या बीजेपी के नेतृत्व वाले NDA में शामिल होता है, तो लोकसभा में सरकार के लिए बिल पारित कराना बहुत आसान हो जाएगा। वर्तमान में लोकसभा में NDA को कुछ सीटों की कमी महसूस होती थी, लेकिन TMC के विभाजन से बीजेपी को वो जादुई आंकड़ा आसानी से मिल सकता है, जिससे विपक्ष की आवाज कमजोर पड़ जाएगी।

शरद पवार और उद्धव ठाकरे जैसी हो गई स्थिति

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ममता बनर्जी आज उसी दौर से गुजर रही हैं, जिससे कुछ साल पहले शरद पवार और उद्धव ठाकरे को गुजरना पड़ा था। जिस तरह से NCP और Shiv Sena का विभाजन हुआ और अंततः उसका फायदा बीजेपी को मिला, बंगाल में भी उसी स्क्रिप्ट पर अमल होता दिख रहा है। ममता बनर्जी चुपचाप मन मसोस कर रह गई हैं, क्योंकि उनके अपने लोग ही अब दूसरा खेमा बना रहे हैं। यह राष्ट्रीय स्तर पर क्षेत्रीय दलों के लिए एक बड़ा सबक भी है।

राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा छिनने का खतरा

तृणमूल कांग्रेस के सामने अब अपनी राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा बचाने की भी बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। चुनाव आयोग के नियमों के अनुसार, अगर पार्टी के सांसदों की संख्या निर्धारित सीमा से कम हो जाती है या पार्टी कई हिस्सों में बंट जाती है, तो उसका राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा छिन सकता है। अगर TMC राष्ट्रीय पार्टी नहीं रहती है, तो उसे चुनाव चिह्न आरक्षित रखने और अन्य सुविधाओं से हाथ धोना पड़ेगा। यह स्थिति ममता बनर्जी की राष्ट्रीय राजनीति में पहुंच को पूरी तरह से खत्म कर सकती है।

आगे की राजनीतिक रणनीति क्या होगी?

अब देखना यह होगा कि ममता बनर्जी इस संकट से कैसे उबरती हैं और क्या वे अपने विद्रोही नेताओं को मनाने में कामयाब होती हैं। वहीं, बीजेपी भी अपनी रणनीति के तहत TMC के असंतुष्ट नेताओं को अपने साथ मिलाने की पूरी कोशिश करेगी, ताकि लोकसभा में उनके आंकड़े मजबूत हों। बंगाल में भले ही बीजेपी को तत्काल सत्ता मिलने की उम्मीद कम हो, लेकिन दिल्ली की गद्दी और संसदीय गणित को मजबूत करने के लिए यह टूट वरदान साबित हो सकती है। आने वाला समय इस राजनीतिक ड्रामे के नए मोड़ दिखाएगा।

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