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कौन हैं सार्थक सिद्धांत? 17 वर्षीय छात्र जिसने CBSE के OSM विवाद को संसद तक पहुंचाया

झारखंड के 17 वर्षीय छात्र सार्थक सिद्धांत इन दिनों देशभर में चर्चा का विषय बने हुए हैं। उन्होंने केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) के ऑन-स्क्रीन मार्किंग सिस्टम (OSM) और उससे जुड़े टेंडर नियमों में कथित अनियमितताओं पर सवाल उठाकर शिक्षा जगत में हलचल मचा दी। उनकी ओर से जुटाए गए दस्तावेजों और तथ्यों ने मामला संसदीय समिति तक पहुंचा दिया। एक छात्र द्वारा इतनी गहराई से जांच-पड़ताल कर राष्ट्रीय स्तर पर बहस छेड़ना अपने आप में एक बड़ी घटना माना जा रहा है।

छात्र से बने खोजी विश्लेषक

सार्थक सिद्धांत इसी वर्ष CBSE की 12वीं बोर्ड परीक्षा में शामिल हुए थे। परिणाम आने के बाद कई छात्रों ने मूल्यांकन प्रक्रिया और उत्तर पुस्तिकाओं की स्कैन कॉपी को लेकर सवाल उठाने शुरू किए। इसी दौरान सार्थक ने भी अपनी उत्तर पुस्तिका के पुनर्मूल्यांकन के लिए आवेदन किया। दस्तावेजों का अध्ययन करते हुए उन्हें कुछ विसंगतियों का संदेह हुआ, जिसके बाद उन्होंने OSM प्रणाली और उससे जुड़े टेंडर दस्तावेजों की विस्तृत जांच शुरू कर दी। कई दिनों की मेहनत के बाद उन्होंने अपने निष्कर्ष सार्वजनिक किए।

टेंडर नियमों में बदलाव पर उठाए सवाल

सार्थक का दावा है कि OSM टेंडर से जुड़े नियमों में ऐसे बदलाव किए गए, जिनसे कुछ कंपनियों को फायदा मिल सकता था। उन्होंने टेंडर दस्तावेजों की तुलना करते हुए बताया कि पहले मौजूद कुछ पात्रता शर्तों और प्रदर्शन से जुड़े नियमों को बाद में संशोधित या हटाया गया। उनके अनुसार, इन परिवर्तनों ने चयन प्रक्रिया को प्रभावित किया हो सकता है। हालांकि इन दावों की आधिकारिक जांच अभी जारी है और अंतिम निष्कर्ष जांच पूरी होने के बाद ही सामने आएंगे।

संसदीय समिति के सामने रखा पक्ष

मामले की गंभीरता को देखते हुए संसद की स्थायी समिति ने सार्थक को बुलाकर उनका पक्ष सुना। संसद भवन में हुई बैठक में उन्होंने दस्तावेजों और अपने विश्लेषण के आधार पर विस्तृत प्रस्तुति दी। उन्होंने समिति को बताया कि किन बिंदुओं पर उन्हें प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी महसूस हुई और किन नियमों में बदलाव को लेकर सवाल उठ रहे हैं। उनकी प्रस्तुति के बाद यह मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया।

OSM के विरोध में नहीं, पारदर्शिता के पक्ष में

सार्थक ने स्पष्ट किया है कि वे ऑन-स्क्रीन मार्किंग सिस्टम के खिलाफ नहीं हैं। उनका मानना है कि डिजिटल मूल्यांकन व्यवस्था शिक्षा प्रणाली को आधुनिक और प्रभावी बना सकती है। लेकिन इतनी बड़ी व्यवस्था को लागू करने से पहले व्यापक परीक्षण और मजबूत निगरानी तंत्र आवश्यक है। उनका कहना है कि किसी भी तकनीकी प्रणाली की विश्वसनीयता तभी बनी रह सकती है जब उसमें पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित हो।

सरकार ने शुरू कराई जांच

विवाद बढ़ने के बाद सरकार ने पूरे मामले की जांच के आदेश दिए हैं। साथ ही संबंधित प्रक्रियाओं की समीक्षा के लिए एक समिति का गठन किया गया है। जांच का उद्देश्य यह पता लगाना है कि टेंडर प्रक्रिया और OSM प्रणाली के क्रियान्वयन में कहीं कोई अनियमितता तो नहीं हुई। अधिकारियों का कहना है कि जांच निष्पक्ष तरीके से की जाएगी और तथ्यों के आधार पर आवश्यक निर्णय लिए जाएंगे।

युवा जागरूकता का बना प्रतीक

सार्थक सिद्धांत की पहल ने यह दिखाया है कि जागरूक और जिम्मेदार युवा भी व्यवस्था में पारदर्शिता की मांग कर सकते हैं। एक छात्र द्वारा दस्तावेजों का अध्ययन कर इतने बड़े मुद्दे को राष्ट्रीय बहस का विषय बना देना लोकतांत्रिक भागीदारी का उदाहरण माना जा रहा है। चाहे जांच का अंतिम परिणाम जो भी हो, लेकिन इस मामले ने शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही और पारदर्शिता पर नई चर्चा जरूर शुरू कर दी है।

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