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महिला आरक्षण पर संसद में तीखी बहस: इकरा हसन ने उठाए बड़े सवाल, रखीं 4 अहम मांगें

संसद में महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयक पर चर्चा के दौरान कैराना की सांसद इकरा हसन ने सरकार की नीतियों पर कड़ा प्रहार किया। उन्होंने आरक्षण लागू करने में देरी, पुराने आंकड़ों के उपयोग और सामाजिक न्याय की अनदेखी जैसे मुद्दों को उठाते हुए इसे महिलाओं के साथ अन्याय बताया। इकरा हसन ने स्पष्ट कहा कि महिला आरक्षण का लाभ समाज के हर वर्ग तक पहुंचना चाहिए, न कि केवल सीमित तबकों तक। इसी के साथ उन्होंने चार महत्वपूर्ण मांगें रखते हुए सरकार से पारदर्शी और न्यायसंगत व्यवस्था लागू करने की अपील की।

सरकार की मंशा पर सवाल, ‘राजनीतिक लाभ’ का आरोप

इकरा हसन ने अपने संबोधन में सरकार की नीयत पर सवाल उठाते हुए कहा कि महिला आरक्षण को लागू करने में जानबूझकर देरी की जा रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया का बहाना बनाकर इस मुद्दे को टाला जा रहा है, ताकि भविष्य के चुनावों में इसका राजनीतिक फायदा उठाया जा सके। उनके मुताबिक, यह कदम महिलाओं को वास्तविक प्रतिनिधित्व देने के बजाय एक चुनावी रणनीति का हिस्सा प्रतीत होता है। उन्होंने सरकार से स्पष्ट टाइमलाइन तय करने और आरक्षण को बिना देरी लागू करने की मांग की।

पुराने आंकड़ों पर आधारित योजना पर आपत्ति

सांसद ने सरकार द्वारा पुराने जनगणना आंकड़ों के उपयोग पर गंभीर चिंता जताई। उनका कहना था कि 2011 के आंकड़ों के आधार पर भविष्य का प्रतिनिधित्व तय करना व्यावहारिक नहीं है, क्योंकि तब तक ये आंकड़े काफी पुराने हो जाएंगे। उन्होंने इसे लोकतांत्रिक सिद्धांतों के खिलाफ बताते हुए कहा कि प्रतिनिधित्व हमेशा वर्तमान जनसंख्या के अनुसार होना चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने संविधान के प्रावधानों का हवाला देते हुए कहा कि “एक व्यक्ति-एक वोट” की अवधारणा तभी सार्थक होगी जब डेटा अद्यतन और सटीक हो।

परिसीमन प्रक्रिया और संवैधानिक संतुलन पर चिंता

इकरा हसन ने परिसीमन आयोग को दी जा रही व्यापक शक्तियों पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि आयोग के फैसलों को न्यायिक समीक्षा से बाहर रखना लोकतंत्र के संतुलन के लिए खतरा हो सकता है। उनके अनुसार, किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में “चेक एंड बैलेंस” बेहद जरूरी होते हैं, और अगर किसी संस्था को असीमित अधिकार दिए जाएं तो पारदर्शिता प्रभावित हो सकती है। उन्होंने मांग की कि परिसीमन प्रक्रिया को अधिक जवाबदेह और न्यायिक निगरानी के दायरे में लाया जाए।

‘महिलाएं एक समान वर्ग नहीं’—सामाजिक विविधता पर जोर

अपने भाषण में इकरा हसन ने यह भी स्पष्ट किया कि महिलाओं को एक समान समूह मानना वास्तविकता से दूर है। उन्होंने कहा कि महिलाओं की सामाजिक स्थिति उनकी जाति, वर्ग और आर्थिक पृष्ठभूमि से प्रभावित होती है। खासतौर पर पिछड़े और अल्पसंख्यक समुदायों की महिलाओं के लिए राजनीति में प्रवेश करना आज भी चुनौतीपूर्ण है। ऐसे में बिना विशेष प्रावधानों के महिला आरक्षण का लाभ केवल संपन्न वर्ग तक सीमित रह सकता है, जिससे सामाजिक न्याय का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा।

इकरा हसन की 4 प्रमुख मांगें

इकरा हसन ने महिला आरक्षण को प्रभावी बनाने के लिए चार अहम सुझाव दिए। उन्होंने कहा कि आरक्षण को जनगणना और परिसीमन से अलग कर समयबद्ध तरीके से लागू किया जाए। इसके अलावा, यदि जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व की बात हो रही है तो महिलाओं को उनकी वास्तविक हिस्सेदारी के अनुसार अधिक आरक्षण दिया जाना चाहिए। उन्होंने ओबीसी और अल्पसंख्यक महिलाओं के लिए अलग कोटा सुनिश्चित करने पर भी जोर दिया। साथ ही आर्थिक रूप से कमजोर महिलाओं के लिए चुनावी खर्च सरकार द्वारा वहन करने की व्यवस्था करने की मांग रखी।

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