परिसीमन बिल पर सियासी घमासान: महिला आरक्षण के साथ जोड़ने पर केंद्र-विपक्ष आमने-सामने
संसद के विशेष सत्र में केंद्र सरकार द्वारा पेश किए गए परिसीमन (डीलिमिटेशन) बिल ने देश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। महिला आरक्षण को इस प्रक्रिया से जोड़ने के प्रस्ताव पर जहां सरकार इसे ऐतिहासिक कदम बता रही है, वहीं विपक्ष इसे राजनीतिक रणनीति करार देते हुए सवाल उठा रहा है। संसद से लेकर राज्यों तक इस मुद्दे पर तीखी बयानबाज़ी जारी है।
सरकार का पक्ष: निष्पक्ष प्रक्रिया और महिला सशक्तिकरण पर जोर
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में स्पष्ट किया कि परिसीमन प्रक्रिया पूरी तरह निष्पक्ष होगी और किसी भी राज्य या वर्ग के साथ अन्याय नहीं किया जाएगा। उन्होंने भरोसा दिलाया कि पहले से लागू अनुपात में कोई बदलाव नहीं होगा। सरकार का कहना है कि लोकसभा सीटों को 543 से बढ़ाकर 816 करने और एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रस्ताव देश में प्रतिनिधित्व को अधिक संतुलित बनाएगा। प्रधानमंत्री ने इसे महिलाओं के अधिकार का सम्मान बताते हुए राजनीतिक दलों से समर्थन की अपील की।
विपक्ष का आरोप: महिला आरक्षण की आड़ में राजनीतिक लाभ
कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी ने बिल को आगामी चुनावों के लिए भाजपा की रणनीति बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ राज्यों की राजनीतिक ताकत को कमजोर कर सत्ता संतुलन बदलने की कोशिश की जा रही है। उनका कहना था कि बिल को गहराई से देखने पर इसमें राजनीति की स्पष्ट झलक मिलती है। उन्होंने सरकार पर सवाल उठाते हुए पूछा कि पहले जनगणना और परिसीमन की शर्त रखने के बाद अब जल्दबाज़ी में पुराने आंकड़ों के आधार पर प्रक्रिया क्यों शुरू की जा रही है।
महिला आरक्षण पर सहमति, लेकिन प्रक्रिया पर विवाद
कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने स्पष्ट किया कि महिला आरक्षण का सभी दल समर्थन करते हैं, लेकिन इसे परिसीमन से जोड़ना विवाद की जड़ है। उन्होंने सरकार की तुलना नोटबंदी जैसे फैसलों से करते हुए कहा कि इतनी बड़ी प्रक्रिया बिना व्यापक चर्चा के नहीं की जानी चाहिए। समाजवादी पार्टी की डिंपल यादव ने भी यही सवाल उठाया और कहा कि मौजूदा 543 सीटों पर ही 2029 चुनाव के लिए आरक्षण लागू किया जा सकता है।
राज्यों में विरोध: दक्षिण और क्षेत्रीय दलों की चिंता
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन और उनकी पार्टी डीएमके ने इस बिल के खिलाफ खुलकर विरोध दर्ज कराया। वहीं के चंद्रशेखर राव की पार्टी भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) ने भी केंद्र के खिलाफ आंदोलन की घोषणा की है। इन दलों का तर्क है कि परिसीमन से जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण होगा, जिससे दक्षिणी राज्यों का प्रतिनिधित्व प्रभावित हो सकता है।
मुख्य प्रस्ताव: सीटों में बढ़ोतरी और आरक्षण का ढांचा
गृह मंत्री अमित शाह के अनुसार प्रस्तावित बिल के तहत लोकसभा सीटों की संख्या 816 तक बढ़ाई जा सकती है। साथ ही करीब 272 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने की योजना है। यह प्रावधान 2023 में पारित नारी शक्ति वंदन कानून पर आधारित है, जिसमें 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया था। हालांकि उस कानून में इसे लागू करने के लिए नई जनगणना और परिसीमन को अनिवार्य शर्त बनाया गया था।
मुख्य विवाद: जनगणना और परिसीमन का समय
विपक्ष का सबसे बड़ा सवाल यही है कि बिना नई जनगणना के परिसीमन कैसे किया जा सकता है। उनका कहना है कि 2011 के आंकड़ों के आधार पर सीटों का पुनर्निर्धारण करना न्यायसंगत नहीं होगा। इसके अलावा यह भी आरोप है कि सरकार महिला आरक्षण को लागू करने में देरी कर रही है और परिसीमन को उससे जोड़कर प्रक्रिया को जटिल बना रही है।
राजनीतिक असर: 2029 चुनाव पर नजर
सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों इस बिल को 2029 के आम चुनावों से जोड़कर देख रहे हैं। जहां सरकार इसे ऐतिहासिक सुधार और महिला सशक्तिकरण की दिशा में बड़ा कदम बता रही है, वहीं विपक्ष को आशंका है कि इससे चुनावी गणित प्रभावित हो सकता है। आने वाले दिनों में संसद और सड़कों पर इस मुद्दे पर बहस और तेज होने की संभावना है।