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परमाणु ताकत वाला पाकिस्तान क्यों नहीं रोक पा रहा तालिबान? गुरिल्ला युद्ध ने बदले जंग के नियम


अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमा पर बढ़ता सैन्य टकराव एक बड़ा रणनीतिक सवाल खड़ा कर रहा है—आधुनिक हथियारों और परमाणु क्षमता से लैस पाकिस्तान को तालिबान जैसे असंगठित लड़ाके बार-बार चुनौती कैसे दे रहे हैं? विशेषज्ञों के अनुसार इसका जवाब पारंपरिक सैन्य शक्ति में नहीं, बल्कि गुरिल्ला रणनीति, पहाड़ी भूगोल और स्थानीय समर्थन के जटिल समीकरण में छिपा है।


⚔️ खुली जंग और बढ़ता तनाव

सीमा संघर्ष के बीच पाकिस्तान ने अफगान क्षेत्रों में हवाई हमले किए और सैन्य कार्रवाई को “ओपन वॉर” जैसा स्वरूप दे दिया। जवाब में तालिबान ने सीमा चौकियों पर कब्जे और पाकिस्तानी सेना को नुकसान पहुंचाने के दावे किए हैं।

हालांकि दोनों पक्षों के आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।

यह संघर्ष पारंपरिक युद्ध नहीं बल्कि सीमित लेकिन लगातार चलने वाला हाई-इंटेंसिटी बॉर्डर कॉन्फ्लिक्ट बनता दिख रहा है।


🪖 गुरिल्ला रणनीति बनाम पारंपरिक सेना

पाकिस्तान के पास आधुनिक लड़ाकू विमान, मिसाइल सिस्टम और संगठित सैन्य ढांचा मौजूद है। इसके उलट तालिबान पारंपरिक सेना की तरह नहीं लड़ता।

तालिबान की रणनीति में शामिल हैं:

  • छोटे मोबाइल लड़ाकू समूह
  • हिट-एंड-रन हमले
  • रात के ऑपरेशन
  • अचानक सीमा पार घुसपैठ

गुरिल्ला युद्ध बड़ी सेना की ताकत को कम कर देता है क्योंकि लक्ष्य स्पष्ट नहीं होते और लड़ाई लगातार फैलती रहती है।


🏔️ पहाड़ी भूगोल: तालिबान का प्राकृतिक किला

संघर्ष का केंद्र डूरंड लाइन के आसपास के दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र हैं—नंगरहार, खोस्त और पकतीका जैसे इलाके।

इन क्षेत्रों की विशेषताएं:

  • संकरी घाटियां
  • गुफाएं और पहाड़ी छिपने के ठिकाने
  • सीमित सड़क नेटवर्क

जहां टैंक और भारी सैन्य वाहन धीमे पड़ जाते हैं, वहीं स्थानीय लड़ाके तेजी से मूवमेंट कर पाते हैं। यही भूगोल तालिबान की सबसे बड़ी सुरक्षा ढाल बन जाता है।


👥 पश्तून समर्थन और सामाजिक नेटवर्क

डूरंड लाइन के दोनों ओर बड़ी पश्तून आबादी रहती है। सीमा का सामाजिक और सांस्कृतिक विभाजन स्पष्ट नहीं है।

विशेषज्ञों के अनुसार स्थानीय समर्थन तालिबान को देता है:

  • सुरक्षित ठिकाने
  • रसद और जानकारी
  • सीमा पार आवाजाही की सुविधा

स्थानीय समुदाय का समर्थन किसी भी गुरिल्ला आंदोलन की असली ताकत माना जाता है।


🎯 पाकिस्तान की रणनीतिक सीमाएं

पाकिस्तान भले ही एयरस्ट्राइक के जरिए भारी नुकसान पहुंचाने का दावा करता हो, लेकिन जमीन पर कई चुनौतियां मौजूद हैं:

  • लंबी और संवेदनशील सीमा
  • छोटे-छोटे तालिबान मॉड्यूल
  • जटिल जनजातीय राजनीति
  • लगातार बदलता युद्धक्षेत्र

आधुनिक हथियार निर्णायक जीत की गारंटी नहीं देते, खासकर जब दुश्मन पारंपरिक युद्ध नियमों से बाहर लड़ रहा हो।


📡 सूचना युद्ध भी उतना ही अहम

संघर्ष के दौरान दोनों पक्ष अलग-अलग दावे कर रहे हैं—कहीं चौकियों पर कब्जे की बात, तो कहीं सैन्य नुकसान के आंकड़े।

आधुनिक युद्ध केवल हथियारों से नहीं, बल्कि सूचना और मनोवैज्ञानिक बढ़त से भी लड़ा जाता है।


🌍 बड़ी तस्वीर: बदलती युद्ध रणनीति

इतिहास बताता है कि अफगान क्षेत्र में बड़ी सैन्य शक्तियां भी लंबे समय तक निर्णायक जीत हासिल नहीं कर पाईं। गुरिल्ला युद्ध, भूगोल और स्थानीय सामाजिक संरचना अक्सर शक्तिशाली सेनाओं को उलझाए रखती है।

यह संघर्ष दिखाता है कि 21वीं सदी में युद्ध की ताकत केवल हथियारों से नहीं बल्कि रणनीति, भूगोल और समाजशास्त्र से तय होती है।


परमाणु हथियारों और आधुनिक सेना के बावजूद पाकिस्तान को तालिबान से चुनौती मिलना इस बात का संकेत है कि आधुनिक युद्ध का स्वरूप बदल चुका है। डूरंड लाइन पर जारी टकराव आने वाले समय में पूरे क्षेत्र की सुरक्षा और राजनीतिक संतुलन को प्रभावित कर सकता है।

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