राजस्थान में विधानसभा सत्र चल रहा है और रोज़ सदन का नज़ारा ऐसा लगता है मानो नेता लोग रणभूमि में उतरने से पहले बाहें चढ़ाकर तलवार निकाल रहे हों! चेहरे पर वीर रस, तेवरों में तूफ़ान—जैसे आज तो निर्णायक जंग होगी!
लेकिन मज़ेदार बात ये है कि यही बाहें चढ़ाने वाले नेता अपने-अपने इलाकों में जाने से घबराते नज़र आते हैं। वहाँ तो बाहें चढ़ाना दूर, कदम रखने में ही पसीने छूट जाते हैं। जनता का सामना करने में कहीं पतलून न उतर जाए—इस डर से कई माननीय दूर-दूर तक नज़र नहीं आते। हाल ये है कि प्रदेश के ज़्यादातर नेताओं का यही “ग्राउंड रियलिटी” बन चुका है।
इधर राजनीतिक गलियारों में एक और चर्चा ज़ोरों पर है—लोग कह रहे हैं कि राजस्थान की भाजपा सरकार जानबूझकर निकाय और पंचायत चुनाव टाल रही है। वजह? क्योंकि फिलहाल जनता का मूड सरकार के पक्ष में नहीं है। तभी तो चुनाव की तारीखें आगे-पीछे सरकाई जा रही हैं।
अरे भाई! चुनाव टालने से क्या होगा? जनता के बीच जाना पड़ेगा, काम करके दिखाना पड़ेगा। वरना जिस “डबल इंजन सरकार” का ढोल पीटा जा रहा है, कहीं ऐसा न हो कि उसी चक्कर में दिल्ली वाला इंजन भी पटरी से उतर जाए!
अब बात करें नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली की—साहब इन दिनों फुल फॉर्म में हैं! सरकार को किसी भी एंगल से नहीं छोड़ रहे। कभी तीखे तेवरों में हमला, तो कभी शेर-ओ-शायरी के तीर चला कर पूरी सरकार को धराशायी कर देते हैं।
पिछले दिनों सदन में उन्होंने सीधे मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा पर कविता पढ़ डाली—और वो कविता सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल गई।
वैसे मुख्यमंत्री जी की जल्दबाज़ी भी कई बार उन पर भारी पड़ जाती है। कभी “पत्थर में कीचड़ मारने” जैसी कहावतें ग़लत बोल देते हैं, तो कभी ज़िंदा व्यक्ति को ही श्रद्धांजलि दे बैठते हैं! बस फिर क्या—जूली साहब ऐसे मौके छोड़ते कहाँ हैं? मुद्दे को पकड़ते हैं और सरकार पर सियासी चाबुक बरसा देते हैं।
कुल मिलाकर राजस्थान की सियासत इन दिनों विधानसभा के अंदर भी गरमा-गरम है और बाहर भी पूरी तरह मसालेदार!
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