ग्लोबल तनाव के बीच भारत की तेज रफ्तार बरकरार, Q3 में GDP ग्रोथ 8% पार होने का अनुमान
वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूती से आगे बढ़ती दिख रही है। State Bank of India (SBI) की ताजा रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 की तीसरी तिमाही में भारत की GDP ग्रोथ 8% से अधिक रह सकती है, जो देश को दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में बनाए रखेगी।
🏙️ गांव और शहर दोनों से मिल रही मजबूती
SBI के ग्रुप चीफ इकोनॉमिक एडवाइजर Soumya Kanti Ghosh के अनुसार ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में मांग मजबूत बनी हुई है।
- कृषि गतिविधियों में तेजी से ग्रामीण खपत बढ़ी
- त्योहारों के बाद शहरी बाजारों में खरीदारी तेज
- सरकारी योजनाओं और बढ़ती आय ने उपभोग को सहारा दिया
घरेलू मांग मजबूत होने से भारत बाहरी आर्थिक झटकों से काफी हद तक सुरक्षित बना हुआ है।
🔄 27 फरवरी से बदलेगा GDP मापने का तरीका
भारत सरकार GDP की गणना प्रणाली में बड़ा बदलाव करने जा रही है।
- बेस ईयर: 2011-12 से बदलकर 2022-23
- नई GDP सीरीज: 27 फरवरी को जारी
इस बदलाव का उद्देश्य डिजिटल अर्थव्यवस्था, ई-कॉमर्स और आधुनिक सर्विस सेक्टर की गतिविधियों को सही तरीके से आंकड़ों में शामिल करना है।
नई सीरीज से देश की वास्तविक आर्थिक गतिविधियों की ज्यादा सटीक तस्वीर सामने आएगी।
📊 नए डेटा से बदलेगी आर्थिक तस्वीर
नई गणना प्रणाली में कई आधुनिक आर्थिक संकेतकों को जोड़ा जाएगा, जैसे:
- Goods and Services Tax (GST) डेटा
- ई-वाहन रजिस्ट्रेशन
- प्राकृतिक गैस खपत
- इनफॉर्मल सेक्टर का बेहतर आकलन
यह सुधार भारत की अर्थव्यवस्था को वैश्विक मानकों के अनुरूप बनाने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।
🌍 चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की राह
विशेषज्ञों का मानना है कि मजबूत विकास दर और सांख्यिकीय सुधारों के बाद भारत जल्द ही दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में अपनी स्थिति मजबूत कर सकता है।
उच्च विकास दर + मजबूत घरेलू बाजार + डिजिटल ट्रांजिशन भारत को दीर्घकालिक ग्रोथ ट्रैक पर बनाए रख सकते हैं।
🌐 वैश्विक चुनौतियों के बीच भारत की मजबूती
दुनिया में भू-राजनीतिक तनाव, डिजिटलीकरण और डीकार्बोनाइजेशन से आर्थिक अनिश्चितता बनी हुई है। इसके बावजूद आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार वित्त वर्ष 2027 में भारत की विकास दर 6.8% से 7.2% के बीच रहने का अनुमान है।
भारत की ग्रोथ अब सिर्फ निर्यात पर नहीं, बल्कि घरेलू मांग और नीतिगत स्थिरता पर आधारित होती जा रही है।