पाकिस्तान में ‘फर्जी डिग्री’ वाला जज! 5 साल तक हाईकोर्ट में सुनाते रहे फैसले, अदालत ने नियुक्ति करार दी गैरकानूनी
पाकिस्तान की न्यायिक व्यवस्था को झकझोर देने वाला मामला सामने आया है। इस्लामाबाद हाईकोर्ट ने अपने ही एक जज की नियुक्ति को अवैध घोषित कर दिया है, क्योंकि उनकी LLB डिग्री ही फर्जी पाई गई। चौंकाने वाली बात यह है कि कथित फर्जी डिग्री के आधार पर वह तीन दशक तक कानूनी पेशे में सक्रिय रहे और करीब पांच साल तक हाईकोर्ट के जज भी बने रहे।
🟥 116 पन्नों का फैसला, जज की कुर्सी गई
इस्लामाबाद हाईकोर्ट ने 116 पन्नों के विस्तृत आदेश में जस्टिस तारिक महमूद जहांगीरी को पद से हटाने का फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि उनकी नियुक्ति शुरुआत से ही अवैध थी क्योंकि उनके पास मान्य कानून की डिग्री नहीं थी।
जहांगीरी दिसंबर 2020 में हाईकोर्ट जज बने थे, लेकिन सितंबर 2024 में उन्हें न्यायिक कार्य से रोक दिया गया था। अब अंतिम फैसला सामने आ गया है।
किसी हाईकोर्ट जज की नियुक्ति को अवैध घोषित किया जाना पाकिस्तान की न्यायिक विश्वसनीयता पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।
🟥 फर्जी एनरोलमेंट नंबर से दी परीक्षा
अदालत के फैसले के अनुसार जहांगीरी ने 1988 में LLB पार्ट-1 की परीक्षा एक फर्जी एनरोलमेंट नंबर से दी थी। परीक्षा के दौरान नकल करते पकड़े जाने पर यूनिवर्सिटी ने उन्हें तीन साल के लिए प्रतिबंधित कर दिया था।
लेकिन सजा पूरी करने के बजाय उन्होंने दूसरे नाम और दूसरे छात्र के एनरोलमेंट नंबर से फिर परीक्षा दे डाली।
यह मामला सिर्फ अकादमिक धोखाधड़ी नहीं बल्कि सुनियोजित पहचान छिपाने और सिस्टम की कमजोरियों का फायदा उठाने का उदाहरण माना जा रहा है।
🟥 किसी और छात्र के नंबर से पास की परीक्षा
कोर्ट रिकॉर्ड के मुताबिक 1990 में जहांगीरी ने “तारिक जहांगीरी” नाम से परीक्षा दी और इम्तियाज अहमद नामक छात्र का एनरोलमेंट नंबर इस्तेमाल किया। बाद में LLB पार्ट-2 की परीक्षा उन्होंने अपने असली नाम से दी, लेकिन वहां भी अलग एनरोलमेंट नंबर पाया गया।
यूनिवर्सिटी अधिकारियों ने स्पष्ट कहा कि एक कोर्स के लिए दो एनरोलमेंट नंबर होना असंभव है।
इससे साफ संकेत मिलता है कि डिग्री हासिल करने की पूरी प्रक्रिया संदिग्ध थी और दस्तावेजी स्तर पर गंभीर गड़बड़ी हुई।
🟥 कॉलेज में दाखिला ही नहीं, फिर भी मिल गई डिग्री
गवर्नमेंट इस्लामिया लॉ कॉलेज के प्रिंसिपल ने अदालत को बताया कि जहांगीरी का संस्थान में कभी औपचारिक प्रवेश ही नहीं हुआ था।
अदालत ने टिप्पणी की कि जो चीज शुरुआत से अवैध हो, उसे बाद में प्रशासनिक फैसलों से वैध नहीं बनाया जा सकता। इसी आधार पर उनकी LLB डिग्री पूरी तरह रद्द कर दी गई।
यह मामला केवल व्यक्ति विशेष का नहीं बल्कि शिक्षा सत्यापन और नियुक्ति प्रक्रिया की गंभीर विफलता को उजागर करता है।
🟥 30 साल का करियर और सिस्टम पर सवाल
कोर्ट ने माना कि जहांगीरी तीन दशक से अधिक समय तक कानूनी पेशे में सक्रिय रहे। सवाल यह उठ रहा है कि इतने लंबे समय तक उनकी डिग्री की जांच क्यों नहीं हुई और न्यायपालिका तक पहुंचने से पहले सत्यापन प्रक्रिया कैसे विफल रही।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटना पाकिस्तान में संस्थागत निगरानी, नियुक्ति प्रक्रिया और पारदर्शिता पर बड़ी बहस को जन्म दे सकती है।
🟥 न्यायपालिका की साख पर असर
एक हाईकोर्ट जज का फर्जी डिग्री के आधार पर नियुक्त होना न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है। अब यह भी चर्चा है कि उनके द्वारा दिए गए पुराने फैसलों की कानूनी स्थिति क्या होगी।
यदि पूर्व फैसलों को चुनौती दी गई तो पाकिस्तान की न्यायिक प्रणाली को लंबे समय तक कानूनी जटिलताओं का सामना करना पड़ सकता है।