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कॉलेजियम सिस्टम फिलहाल देश के लिए सबसे उपयुक्त—पूर्व CJI का स्पष्ट संदेश

सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के पहले राष्ट्रीय सम्मेलन के समापन सत्र में पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने न्यायपालिका से जुड़े कई अहम मुद्दों पर बेबाक राय रखी। उन्होंने कॉलेजियम सिस्टम को लेकर चल रही बहस के बीच इसे वर्तमान समय में देश के लिए सबसे बेहतर व्यवस्था बताया। साथ ही न्यायाधीशों की नियुक्ति, ट्रांसफर और कार्यपालिका की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठाए।

कॉलेजियम सिस्टम पर संतुलित लेकिन स्पष्ट राय

पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने कॉलेजियम प्रणाली को लेकर कहा कि यह कोई परिपूर्ण व्यवस्था नहीं है, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में यह सबसे उपयुक्त विकल्प है। उन्होंने स्वीकार किया कि हर प्रणाली में कुछ कमियां और कुछ मजबूत पक्ष होते हैं, लेकिन वर्षों के अनुभव के आधार पर यह व्यवस्था न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनाए रखने में सक्षम रही है। उनका मानना है कि जब तक कोई बेहतर विकल्प सामने नहीं आता, तब तक कॉलेजियम सिस्टम ही न्यायिक नियुक्तियों के लिए सबसे व्यवहारिक और भरोसेमंद तंत्र बना रहेगा।

नियुक्ति प्रक्रिया: पारदर्शिता और बहुस्तरीय जांच का दावा

उन्होंने स्पष्ट किया कि कॉलेजियम मनमाने तरीके से काम नहीं करता, बल्कि एक तय प्रक्रिया का पालन करता है। हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और वरिष्ठ न्यायाधीशों की सिफारिश के बाद नाम केंद्र सरकार को भेजे जाते हैं, जहां विभिन्न एजेंसियों और खुफिया विभाग से रिपोर्ट ली जाती है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम अंतिम निर्णय करता है। अगर कार्यपालिका को कोई आपत्ति होती है तो उसे भी कॉलेजियम के सामने रखा जाता है और सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद ही अंतिम फैसला लिया जाता है।

नियुक्तियों में देरी पर जताई चिंता

पूर्व CJI ने न्यायाधीशों की नियुक्तियों में हो रही देरी पर नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट कई बार स्पष्ट कर चुका है कि अगर कॉलेजियम किसी नाम की दोबारा सिफारिश करता है, तो कार्यपालिका को उसे मंजूरी देनी चाहिए। इसके बावजूद कई मामलों में अब तक नियुक्तियां लंबित हैं। उन्होंने इसे आरोप-प्रत्यारोप का मुद्दा न बताते हुए भी इस स्थिति पर चिंता जताई और संकेत दिया कि इससे न्यायपालिका की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है।

जजों के ट्रांसफर पर जरूरी हस्तक्षेप का पक्ष

जजों के स्थानांतरण के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि यह कदम हमेशा सामान्य नहीं होता, लेकिन कुछ विशेष परिस्थितियों में जरूरी हो जाता है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि कोई न्यायाधीश बार-बार सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की अनदेखी करता है या उसके फैसलों के विपरीत चलता है, तो क्या कॉलेजियम को निष्क्रिय रहना चाहिए? उनके अनुसार, ऐसी स्थिति में सुधारात्मक कार्रवाई आवश्यक है। उन्होंने बार को न्यायपालिका की “जननी” बताते हुए इस विषय पर गंभीर विचार करने की अपील की।

कार्यपालिका पर भी उठाए गंभीर सवाल

पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने कार्यपालिका की कार्यशैली पर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका हमेशा संयम के साथ काम करती है, लेकिन जब नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है या सत्ता के संतुलन को बिगाड़ने की कोशिश होती है, तब हस्तक्षेप जरूरी हो जाता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि किसी व्यक्ति को केवल संदेह के आधार पर उसका घर गिरा दिया जाता है, तो क्या अदालत चुप रह सकती है? उन्होंने इसे कानून के शासन के लिए गंभीर चुनौती बताया और इस पर व्यापक विचार की आवश्यकता जताई

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