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ईरान पर दबाव की रणनीति क्यों पड़ रही भारी? ट्रंप-नेतन्याहू की उम्मीदों को झटका

अमेरिका और इजराइल को उम्मीद थी कि सैन्य दबाव और लगातार हमलों के जरिए ईरान को कमजोर कर क्षेत्रीय समीकरण बदल दिए जाएंगे, लेकिन हालात इसके उलट दिखाई दे रहे हैं। ईरान न केवल अपने अस्तित्व को बनाए रखने में सफल रहा है, बल्कि उसने रणनीतिक जवाबी क्षमता भी प्रदर्शित की है। अब मध्य-पूर्व एक लंबे और अनिश्चित संघर्ष की ओर बढ़ता नजर आ रहा है।

सैन्य दबाव के बावजूद नहीं टूटा ईरानी तंत्र

डोनाल्ड ट्रंप और इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को भरोसा था कि आर्थिक संकट, प्रतिबंधों और सैन्य हमलों के दबाव में ईरानी शासन कमजोर पड़ जाएगा। लेकिन दशकों से बाहरी दबाव झेलते आए ईरान ने खुद को एक बार फिर संभाल लिया। अमेरिकी हेलिकॉप्टर गिराने जैसी घटनाओं ने संकेत दिया है कि तेहरान अब भी जवाब देने की क्षमता रखता है और संघर्ष से पीछे हटने के मूड में नहीं है।

होर्मुज़ स्ट्रेट बना ईरान का सबसे बड़ा हथियार

ईरान ने दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में शामिल होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर अपने प्रभाव को रणनीतिक ताकत के रूप में इस्तेमाल किया है। इस मार्ग पर तनाव बढ़ने से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय व्यापार प्रभावित हुआ है। विशेषज्ञ मानते हैं कि ईरान इस दबाव का उपयोग भविष्य की वार्ताओं में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए कर सकता है।

ट्रंप समझौते की राह तलाशने में जुटे

अमेरिका के भीतर लंबे युद्ध को लेकर समर्थन सीमित है। ऐसे में राष्ट्रपति ट्रंप ऐसी स्थिति चाहते हैं जिसे राजनीतिक जीत के रूप में पेश किया जा सके। उनकी कोशिश होर्मुज़ स्ट्रेट को दोबारा खोलने और ईरान के परमाणु कार्यक्रम समेत अन्य मुद्दों पर नई बातचीत शुरू कराने की है। हालांकि मौजूदा हालात में यह लक्ष्य आसान दिखाई नहीं दे रहा।

नेतन्याहू की रणनीति पर उठने लगे सवाल

इजराइल लंबे समय से ईरान को सबसे बड़ा खतरा मानता रहा है। लेकिन सैन्य कार्रवाई के बावजूद अपेक्षित परिणाम नहीं मिलने से प्रधानमंत्री नेतन्याहू की नीति पर सवाल उठने लगे हैं। विश्लेषकों का मानना है कि केवल बल प्रयोग के जरिए क्षेत्रीय संतुलन बदलने की रणनीति फिलहाल सफल होती नहीं दिख रही।

खाड़ी देशों और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर बढ़ा दबाव

संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन और अन्य खाड़ी देशों ने अपने आर्थिक भविष्य को स्थिरता और निवेश पर आधारित किया था। लेकिन बढ़ते तनाव और समुद्री व्यापार में बाधाओं ने उनकी चिंताएं बढ़ा दी हैं। यदि संकट लंबा खिंचता है तो वैश्विक तेल बाजार और अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर भी इसका गहरा असर पड़ सकता है।

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