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“जब शादी सिर्फ कागज़ों तक सिमट जाए, तो उसे खत्म कर देना बेहतर है।”Supreme Court on Marriage & Divorce…

सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी सिर्फ एक तलाक के फैसले तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय विवाह कानून और सामाजिक सोच पर गहरा असर डालने वाली है। लंबे समय से अलग रह रहे पति-पत्नी के मामले में शीर्ष अदालत ने साफ कहा कि बिना किसी सुलह की उम्मीद के लंबा अलगाव, दोनों पक्षों के लिए क्रूरता के समान है।

⚖️ क्या है पूरा मामला

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को शिलांग निवासी एक दंपति की तलाक याचिका को मंजूरी दी।
दोनों की शादी 4 अगस्त 2000 को हुई थी, लेकिन महज दो साल बाद 2003 में उनके बीच विवाद शुरू हो गया।
बीते 24 वर्षों से पति-पत्नी अलग-अलग रह रहे थे, और इस दौरान अदालतों में मुकदमेबाजी चलती रही।

🧑‍⚖️ सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने क्या कहा

न्यायमूर्ति मनमोहन और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि

“लंबे समय तक लंबित वैवाहिक मुकदमे विवाह को केवल कागज़ों तक सीमित कर देते हैं।”

पीठ ने स्पष्ट किया कि जब वर्षों तक सुलह के सभी प्रयास विफल हो जाएं, तो ऐसे रिश्ते को जबरन जीवित रखना न तो पति-पत्नी के हित में है और न ही समाज के।

🤝 ‘प्रयास हुए, लेकिन सुलह नहीं’

अदालत ने यह भी माना कि निचली अदालतों और उच्च न्यायालय द्वारा कई बार समझौते के प्रयास किए गए,
लेकिन दोनों पक्ष अपने-अपने दृष्टिकोण पर अड़े रहे।
ऐसे में अदालत का मानना था कि अब विवाह को बनाए रखने का कोई व्यावहारिक उद्देश्य नहीं बचा है।

❗ लंबे समय तक अलग रहना क्यों माना गया ‘क्रूरता’

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि

“सुलह की कोई उम्मीद न होते हुए लंबे समय तक अलग रहना, मानसिक और भावनात्मक क्रूरता के बराबर है।”

अदालत के अनुसार, यह जरूरी नहीं कि क्रूरता केवल शारीरिक हो—भावनात्मक दूरी, निरंतर मुकदमेबाजी और अनिश्चितता भी क्रूरता का रूप ले सकती है।

📜 अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल क्यों किया गया

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए सीधे विवाह को भंग कर दिया।
पीठ ने शिलांग के अतिरिक्त उपायुक्त (न्यायिक) के आदेश को सही ठहराया और
उच्च न्यायालय के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें विवाह को बहाल किया गया था।

🧠 अदालत ने ‘सही-गलत’ तय करने से क्यों किया इनकार

सुप्रीम कोर्ट ने बेहद अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि

“यह समाज या अदालत का काम नहीं है कि वह तय करे कि पति या पत्नी में से कौन सही है।”

अदालत ने माना कि जब दोनों पक्ष आपसी तालमेल से इनकार कर दें, तो वही स्थिति क्रूरता के समान हो जाती है।

🔍 फैसले का सामाजिक और कानूनी महत्व

यह फैसला उन हजारों मामलों के लिए नज़ीर (precedent) बन सकता है,
जहां शादी सिर्फ कानूनी औपचारिकता बनकर रह गई है।
सुप्रीम कोर्ट का यह रुख यह संकेत देता है कि
अब विवाह को बचाने से ज़्यादा, इंसानों की गरिमा और मानसिक शांति को प्राथमिकता दी जाएगी।

सुप्रीम कोर्ट का संदेश साफ है—
शादी मजबूरी नहीं, साझेदारी है।
और जब साझेदारी पूरी तरह टूट जाए, तो उसे सम्मानजनक तरीके से समाप्त करना ही बेहतर रास्ता है।

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