‘तीसरी दुनिया’ के देश क्या हैं और क्यों ट्रंप लगा रहे हैं बैन? शीत युद्ध से लेकर आज तक की कहानी……
अमेरिका में व्हाइट हाउस के पास नेशनल गार्ड पर हुए हमले के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ‘तीसरी दुनिया’ के देशों से लोगों के अमेरिका आने पर बैन लगाने की घोषणा की। लेकिन सवाल उठता है कि आखिर ‘तीसरी दुनिया’ के देश कौन हैं और यह शब्द किस तरह से सामने आया?
‘तीसरी दुनिया’ शब्द की उत्पत्ति
‘तीसरी दुनिया’ की अवधारणा शीत युद्ध के दौर में 1952 में फ्रांसीसी जनसांख्यिकीविद अल्फ्रेड सॉवी ने पेश की थी। उस समय दुनिया दो प्रमुख ब्लॉकों में बंटी थी—पश्चिमी ब्लॉक (अमेरिका के नेतृत्व में) और पूर्वी ब्लॉक (सोवियत संघ के नेतृत्व में)। जो देश इन दोनों में शामिल नहीं थे, उन्हें तीसरी दुनिया के देशों में रखा गया।
पहली और दूसरी दुनिया की पहचान
पहली दुनिया में अमेरिका, पश्चिमी यूरोप, जापान, दक्षिण कोरिया और ऑस्ट्रेलिया जैसे औद्योगिक और लोकतांत्रिक देश शामिल थे। दूसरी दुनिया में सोवियत संघ, पूर्वी यूरोप, चीन, उत्तर कोरिया, वियतनाम, लाओस और कंबोडिया जैसे कम्युनिस्ट देश थे।
तीसरी दुनिया के देशों की परिभाषा
तीसरी दुनिया के देशों में मुख्य रूप से अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के अविकसित कृषि प्रधान देश शामिल थे। हालांकि आज यह शब्द राजनीतिक रूप से आउटडेटेड माना जाता है और आर्थिक रूप से पिछड़े या विकासशील देशों के लिए इसका आधुनिक प्रयोग होता है।
आज के समय में तीसरी दुनिया = विकासशील देश
1991 में सोवियत संघ के पतन के बाद ‘तीसरी दुनिया’ शब्द ने अपना मूल राजनीतिक मतलब खो दिया। अब इसका आधुनिक उपयोग अक्सर उन देशों के लिए होता है जो आर्थिक रूप से कम विकसित हैं। ऐसे देशों को आज आमतौर पर “विकासशील देश” या “कम आय वाले देश” कहा जाता है।
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार अल्प विकसित देश (LDC)
संयुक्त राष्ट्र ने 44 देशों को अल्प विकसित देशों (LDC) की श्रेणी में रखा है। इनमें अफ्रीका के 32 देश (जैसे अंगोला, इथियोपिया, मलावी, रवांडा, युगांडा और जाम्बिया), एशिया के 8 देश (अफगानिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, यमन), कैरेबियन का 1 देश (हैती) और प्रशांत क्षेत्र के 3 देश (किरिबाती, सोलोमन द्वीप, तुवालु) शामिल हैं।
भारत शीत युद्ध में तटस्थ देश था और आज यह एक विकासशील देश है। हालांकि अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है और यह दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है।
‘तीसरी दुनिया’ शब्द अब राजनीतिक रूप से प्रासंगिक नहीं माना जाता, लेकिन ट्रंप द्वारा बैन की घोषणा ने इसे फिर से चर्चा में ला दिया। यह निर्णय मुख्य रूप से अमेरिका की सुरक्षा चिंताओं और अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद के खतरे को देखते हुए लिया गया है। आधुनिक संदर्भ में इसे “विकासशील देशों के नागरिकों पर नियंत्रण” के रूप में देखा जा सकता है।