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“26/11 का असली योद्धा—जिसने नंगी लाठी से AK-47 को झुका दिया”

26 नवंबर 2008…
मुंबई की वह रात जो इतिहास में दर्ज है—स्याही से नहीं, खून और बहादुरी से।

रात के 1 बजकर 26 मिनट।
कामा अस्पताल के बाहर ऐसा अँधेरा पसरा था जैसे शहर अपनी ही धड़कनें सुन रहा हो।
हर तरफ चीखें, सायरन, गोलियों की गूँज—और उसी अँधेरे के बीच एक आदमी था, जो न गोलियों से डरता था, न मौत से।

नाम—तुकाराम गोपाल ओंबले।
पद—असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर, महाराष्ट्र पुलिस।
उम्र—48 साल।
कंधे पर सिर्फ तीन स्टार…
पर सीने में एक पूरा राष्ट्र धड़कता था।

सबसे रोचक बात?
उस रात तुकाराम की ड्यूटी खत्म हो चुकी थी। घर जाने को निकले थे…लेकिन वायरलेस पर सूचना सुनी—आतंकी भाग रहे हैं।और उन्होंने बिना सोचे कहा—
“मैं पास ही हूँ… पहुँच रहा हूँ।”
जिस वक्त पूरा शहर दहशत में बंद हो चुका था,

उस वक्त खाकी की यह एक अकेली परछाईं, अँधेरे को चीरती हुई आगे बढ़ रही थी।

और सामने? टकराया आतंकी अजमल कसाब—वो भी AK-47 लेकर , जो सामने आया उसे गोलियों से भून डालने वाले आतंकी कसाब को लग रहा था उसे कोई नहीं रोक पाएगा…”
पर उसे क्या पता था—

उसके सामने खड़ा एक इंसान जो हथियारों से नहीं डरता बल्कि अपने हौसले और… इरादों से लड़ता है।

जिसके पास कोई बुलेटप्रूफ जैकेट नहीं , कोई आधुनिक हथियार नहीं , कोई ढाल नहीं, बस एक लाठी…और हिम्मत जो बंदूक की नाल से भी बड़ी थी।

जब कसाब ने बंदूक सीधी ओंबले साहब की ओर तानी—
उससे पहले कि वह ट्रिगर दबाता, तुकाराम ओंबले ने दौड़कर बंदूक की नाल पकड़ ली। और फिर जो हुआ…वह इंसानी साहस का ऐसा अध्याय है जो शायद ही कभी दोहराया जाए। कसाब ने एक नहीं…दो नहीं…29 गोलियाँ बरसाईं। सीने में, पेट में, कंधों में— पर तुकाराम ओंबले का हाथ…ढीला नहीं पड़ा।

29 गोलियाँ झेलते हुए भी
उन्होंने बन्दूक नहीं छोड़ी।
बल्कि कसाब को नीचे गिरा दिया।तभी बाकी जवान पहुँचे—
और इतिहास लिखा गया—
और कसाब जिंदा पकड़ा गया।
ओंबले ज़मीन पर गिरते-गिरते भी उनकी ज़ुबान पर सिर्फ एक ही शब्द था—

“पकड़ो… जिंदा पकड़ो…”

उनकी पैंट की जेब में बाद में जो मिला—वह दिल छू लेने वाला सच था।एक पुरानी, मुड़ी हुई फोटो—परिवार की।
घर में पत्नी और दो बेटियाँ इंतज़ार कर रही थीं।

पर ओंबले साहब के लिए
देश पहले था…परिवार बाद में।

20 मिनट…29 गोलियाँ…
पर उनका साहस एक प्रतिशत भी कम नहीं हुआ।
डॉक्टर भी कहने लगे
“इतने वार झेलकर जो 20 मिनट जिंदा रहा, वह लोहे का नहीं—इच्छाशक्ति का बना हुआ था।”

उस रात उनींदी आँखों वाला मुंबई का शहर,
एक योद्धा की शहादत से हमेशा के लिए जाग गया।

इसलिए जब कोई पूछता है—
“26/11 का असली हीरो कौन?” तो पूरा देश एक साथ बोल उठता है—तुकाराम ओंबले।

तुकाराम अंबोले
अमर हो गए।
हमेशा के लिए सिखाकर—की
“अगर जज़्बा सच्चा हो,
तो AK-47 भी इंसान की मुट्ठी से हार जाती है।”

ओंबले साहब को शत-शत नमन।
भारत आपकी वीरता का हमेशा ऋणी रहेगा।

जय हिंद

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