सीकर डबल मर्डर केस में राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, मौत की सजा समेत सभी सजाएं रद्द; 10 आरोपी बरी
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने सीकर के बहुचर्चित डबल मर्डर और कथित ऑनर किलिंग मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए ट्रायल कोर्ट का निर्णय रद्द कर दिया है। अदालत ने मौत की सजा पाने वाले मुख्य आरोपी रामगोपाल सहित सभी 10 आरोपियों को बरी कर दिया। न्यायमूर्ति महेंद्र कुमार गोयल और न्यायमूर्ति भुवन गोयल की खंडपीठ ने डेथ रेफरेंस खारिज करते हुए आरोपियों की अपील स्वीकार कर ली। हाईकोर्ट ने फैसले में पुलिस जांच के दौरान इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को जुटाने, सुरक्षित रखने और अदालत में पेश करने की प्रक्रिया में गंभीर कमियां भी बताईं। अदालत ने डीजीपी को जांच अधिकारियों के लिए प्रशिक्षण और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों से जुड़ी मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तैयार करने के निर्देश दिए हैं।
2019 में प्रेम प्रसंग के चलते हुई थी दो लोगों की हत्या
यह मामला सीकर जिले में 21-22 अक्टूबर 2019 की रात हुई गणपत लाल और प्रेम की हत्या से जुड़ा है। प्रेम मुख्य आरोपी रामगोपाल की बेटी थी। मामले में पुलिस ने हत्या की साजिश और वारदात में शामिल होने के आरोपों के आधार पर कई लोगों को आरोपी बनाया था।अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश संख्या-1, सीकर ने 30 नवंबर 2024 को फैसला सुनाते हुए रामगोपाल को मृत्युदंड दिया था। वहीं, अन्य नौ आरोपियों को आजीवन कारावास सहित अलग-अलग सजाएं सुनाई गई थीं। इस फैसले को आरोपियों ने राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। साथ ही, मौत की सजा की पुष्टि के लिए डेथ रेफरेंस भी हाईकोर्ट के सामने आया।
हाईकोर्ट ने मौत की सजा और अन्य सजाएं कीं रद्द
राजस्थान हाईकोर्ट की खंडपीठ ने मामले में ट्रायल कोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए डेथ रेफरेंस अस्वीकार कर दिया। अदालत ने सभी अपीलकर्ताओं को आरोपों से बरी कर दिया।इस फैसले में अदालत ने पुलिस जांच और अभियोजन पक्ष की ओर से पेश किए गए साक्ष्यों की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठाए। अदालत के अनुसार, मामले में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य अहम थे, लेकिन उन्हें जब्त करने, सुरक्षित रखने और अदालत में प्रमाणित करने की प्रक्रिया में कमियां पाई गईं।हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि आपराधिक मुकदमे में आरोप साबित करने के लिए साक्ष्यों की विश्वसनीयता और उनकी कानूनी प्रक्रिया का पालन जरूरी है। केवल संदेह या कथन के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
CCTV और DVR की जब्ती में मिलीं गंभीर खामियां
हाईकोर्ट ने पाया कि मामले का महत्वपूर्ण आधार सीसीटीवी फुटेज, डीवीआर और पेन ड्राइव जैसे इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य थे। लेकिन पुलिस ने इन्हें जब्त करने और सुरक्षित रखने की प्रक्रिया में आवश्यक सावधानियां नहीं बरतीं।अदालत के सामने आए रिकॉर्ड के अनुसार, रामगोपाल के घर और पेट्रोल पंप से जब्त किए गए डीवीआर और पेन ड्राइव को कथित तौर पर बिना सील किए कब्जे में लिया गया। इन्हें मालखाने में जमा कराने और बाहर निकालने से जुड़ी प्रविष्टियों में भी कमियां पाई गईं। रिकॉर्ड में यह स्पष्ट नहीं था कि उपकरण कब बाहर निकाले गए और उनका इस्तेमाल किसने किया।अदालत ने इसे साक्ष्यों की सुरक्षित अभिरक्षा यानी चेन ऑफ कस्टडी से जुड़ी गंभीर कमी माना। इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए जब्ती से लेकर अदालत में पेश किए जाने तक प्रत्येक चरण का रिकॉर्ड जरूरी होता है।
इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के प्रमाण पत्र पर भी सवाल
हाईकोर्ट ने इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को प्रमाणित करने के लिए पेश किए गए प्रमाण पत्र की वैधता पर भी सवाल उठाए। अदालत के अनुसार, संबंधित गवाह उमेश कुमार ने स्वीकार किया था कि पुलिस की ओर से टाइप किया हुआ पत्र लाया गया और उन्होंने उस पर केवल हस्ताक्षर किए।अदालत ने माना कि इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को प्रमाणित करने के लिए कानूनी प्रावधानों के अनुरूप प्रमाण पत्र और जरूरी प्रक्रिया का पालन होना चाहिए। इस मामले में प्रमाण पत्र की विश्वसनीयता पर संदेह पैदा हुआ।इसके अलावा, निचली अदालत द्वारा आरोपियों की पहचान के लिए गिरफ्तारी मेमो पर लगी तस्वीरों का इस्तेमाल किए जाने पर भी हाईकोर्ट ने सवाल उठाए। गवाहों के अनुसार, तस्वीरें बाद में अलग से विकसित कर जोड़ी गई थीं। अदालत ने माना कि इन तस्वीरों को कानूनी तरीके से साबित नहीं किया गया था।
शुरुआती शिकायत और अन्य साक्ष्यों को लेकर भी उठे सवाल
हाईकोर्ट ने जांच के शुरुआती चरण पर भी गंभीर टिप्पणी की। अदालत के अनुसार, घटना की जानकारी मिलने के बावजूद समय पर एफआईआर दर्ज नहीं की गई और खाटूश्यामजी थाने में दी गई शुरुआती शिकायत को रिकॉर्ड पर लाने में कमी रही।अदालत ने कहा कि वास्तविक शुरुआती शिकायत को छिपाने या उसका उचित रिकॉर्ड नहीं रखने से जांच की निष्पक्षता और एफआईआर की विश्वसनीयता पर सवाल उठ सकते हैं।मृतकों के शवों की बरामदगी, कथित हथियार के रूप में इस्तेमाल केबल के टुकड़ों की जब्ती और आरोपियों के खुलासे संबंधी बयानों को दर्ज करने की प्रक्रिया में भी कमियां बताई गईं। अदालत के अनुसार, भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 के तहत प्रासंगिक जानकारी को आरोपी के सटीक शब्दों और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार दर्ज करना जरूरी है।इसके अलावा, मिट्टी और अन्य नमूनों से जुड़ी एफएसएल रिपोर्ट में खून के मिलान या उससे संबंधित स्पष्ट निष्कर्ष नहीं मिलने की बात भी फैसले में सामने आई।
डीजीपी को दो महीने में SOP बनाने के निर्देश
हाईकोर्ट ने पुलिस जांच में सामने आई कमियों को देखते हुए राजस्थान के पुलिस महानिदेशक (DGP) को महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं। अदालत ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 और भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 के अनुरूप इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य जुटाने, जब्त करने, सुरक्षित रखने और अदालत में प्रमाणित करने के लिए मानक संचालन प्रक्रिया तैयार करने को कहा है।इसके लिए दो महीने की समयसीमा तय की गई है। प्रस्तावित SOP में प्रमुख रूप से ये बिंदु शामिल करने के निर्देश दिए गए हैं:
- सार्वजनिक और निजी स्थानों पर लगे सीसीटीवी कैमरों की समय रहते पहचान करना।
- फुटेज सुरक्षित रखने के लिए संबंधित व्यक्ति या संस्था को लिखित अनुरोध भेजना।
- संभव होने पर मूल स्टोरेज डिवाइस जब्त करना।
- मूल डिवाइस जब्त नहीं होने पर मौके पर फॉरेंसिक कॉपी तैयार करना और उसकी हैश वैल्यू दर्ज करना।
- डिवाइस में दर्ज समय और वास्तविक समय के अंतर को रिकॉर्ड करना।
- मोबाइल और अन्य डिजिटल साक्ष्यों की जब्ती तथा सुरक्षित अभिरक्षा का रिकॉर्ड रखना।
- इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड के लिए भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 63 के अनुरूप प्रमाण पत्र प्राप्त करना।
- जब्त उपकरणों की सीलिंग, लेबलिंग, मालखाना प्रविष्टि और एफएसएल तक भेजने की पूरी प्रक्रिया का रिकॉर्ड रखना।
पुलिस और अभियोजन अधिकारियों के प्रशिक्षण के भी निर्देश
हाईकोर्ट ने डीजीपी को जांच अधिकारियों, थाना प्रभारियों और पर्यवेक्षण अधिकारियों के लिए इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों से संबंधित नियमित प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करने के निर्देश दिए हैं।अदालत ने यह भी कहा कि पर्यवेक्षण अधिकारी चार्जशीट दाखिल करने से पहले यह सुनिश्चित करें कि इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य जुटाने और प्रमाणित करने में SOP तथा कानूनी प्रावधानों का पालन हुआ है या नहीं।इसके अलावा, अभियोजन निदेशक को लोक अभियोजकों के लिए भी विशेष प्रशिक्षण की व्यवस्था करने को कहा गया है, ताकि वे अदालत में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को सही तरीके से पेश और प्रमाणित कर सकें।
तीन महीने में अनुपालना रिपोर्ट पेश करने का आदेश
हाईकोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को अपने निर्देशों पर अमल की रिपोर्ट तीन महीने के भीतर अदालत में प्रस्तुत करने को कहा है। फैसले की प्रति प्रमुख शासन सचिव (गृह), डीजीपी, निदेशक अभियोजन और निदेशक राज्य एफएसएल को आवश्यक कार्रवाई के लिए भेजने के निर्देश भी दिए गए हैं।सीकर के इस मामले में हाईकोर्ट का फैसला केवल आरोपियों की अपील तक सीमित नहीं रहा। अदालत ने पुलिस जांच और डिजिटल साक्ष्य प्रबंधन की प्रक्रिया में सुधार की जरूरत भी रेखांकित की है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि राज्य पुलिस और अभियोजन विभाग निर्धारित समय में इन निर्देशों का पालन किस तरह करते हैं।