राजस्थान में BJP टिकट पर बवाल, रो पड़ीं दावेदार; बोलीं- जमीनी कार्यकर्ताओं की अनदेखी
राजस्थान में नगर निकाय चुनाव के लिए टिकट वितरण के बाद भारतीय जनता पार्टी के भीतर नाराजगी खुलकर सामने आने लगी है। जयपुर में वार्ड 149 से टिकट की दावेदारी कर रहीं बीजेपी नेत्री अंजलि गौतम टिकट नहीं मिलने पर भावुक हो गईं और कैमरे के सामने रो पड़ीं। उन्होंने पार्टी के टिकट वितरण पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि लंबे समय से जमीन पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं की अनदेखी की जा रही है। उनका कहना था कि संगठन में मेहनत करने वालों के बजाय नेताओं की ‘जी-हजूरी’ करने वालों को टिकट दिया जा रहा है। नामांकन के अंतिम दिन सामने आए इस घटनाक्रम ने बीजेपी की अंदरूनी नाराजगी को उजागर कर दिया।
टिकट नहीं मिला तो भावुक हुईं अंजलि गौतम
जयपुर के वार्ड नंबर 149 से बीजेपी के टिकट की दावेदारी कर रहीं अंजलि गौतम को पार्टी ने प्रत्याशी नहीं बनाया। टिकट नहीं मिलने की जानकारी के बाद वह भावुक हो गईं और रोने लगीं। उन्होंने पार्टी के फैसले पर नाराजगी जताते हुए कहा कि उन्होंने लंबे समय तक संगठन के लिए काम किया है। इसके बावजूद टिकट वितरण में उनकी दावेदारी को नजरअंदाज किया गया। अंजलि गौतम ने अपनी नाराजगी सार्वजनिक रूप से जाहिर की, जिससे चुनाव से ठीक पहले बीजेपी के भीतर टिकट को लेकर चल रही खींचतान चर्चा में आ गई।
‘जमीनी कार्यकर्ताओं की नहीं हो रही कद्र’
अंजलि गौतम ने आरोप लगाया कि पार्टी में जमीनी स्तर पर लगातार काम करने वाले कार्यकर्ताओं को उचित महत्व नहीं मिल रहा है। उनका कहना था कि कार्यकर्ता लंबे समय तक पार्टी के लिए मेहनत करते हैं, लेकिन चुनाव के समय टिकट वितरण में उनकी दावेदारी पर विचार नहीं किया जाता। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ ऐसे लोगों को प्राथमिकता मिल रही है, जो नेताओं के करीब रहकर अपनी जगह बनाने में सफल होते हैं। हालांकि, ये आरोप अंजलि गौतम के व्यक्तिगत बयान हैं और पार्टी की ओर से इस आरोप पर विस्तृत प्रतिक्रिया सामने आना बाकी है।
‘भाईसाहब-भाईसाहब’ कहने वालों पर निशाना
टिकट नहीं मिलने से नाराज बीजेपी दावेदार ने पार्टी के भीतर कथित चापलूसी की राजनीति पर भी सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि केवल नेताओं की ‘भाईसाहब-भाईसाहब’ कहकर जी-हजूरी करने वाले लोगों को टिकट मिल रहा है। उनका कहना था कि चुनाव के दौरान वास्तविक जमीनी कार्यकर्ताओं की मेहनत को नजरअंदाज करना संगठन के लिए ठीक नहीं है। उनके इस बयान के बाद बीजेपी के टिकट वितरण को लेकर सोशल मीडिया और स्थानीय राजनीतिक हलकों में भी चर्चा तेज हो गई।
नामांकन के आखिरी दिन बढ़ी नाराजगी
राजस्थान के 309 नगरीय निकायों में चुनाव के लिए नामांकन दाखिल करने का सोमवार को अंतिम दिन था। प्रत्याशियों के पास दोपहर 3 बजे तक नामांकन दाखिल करने का समय था। अंतिम दिन टिकट नहीं मिलने या उम्मीदवार बदले जाने को लेकर कई स्थानों पर पार्टी कार्यकर्ताओं की नाराजगी सामने आई। जयपुर में अंजलि गौतम के भावुक होने के अलावा कांग्रेस से जुड़े विरोध का मामला भी सामने आया। वहीं अलवर में बीजेपी के दो मंडल अध्यक्षों ने टिकट वितरण से नाराज होकर अपने पद से इस्तीफा देने की बात कही।
अलवर में भी बीजेपी के भीतर असंतोष
टिकट वितरण को लेकर नाराजगी सिर्फ जयपुर तक सीमित नहीं रही। अलवर में बीजेपी के दो मंडल अध्यक्षों के इस्तीफे की जानकारी सामने आई। बताया गया कि दोनों पदाधिकारी टिकट वितरण से असंतुष्ट थे। चुनाव के ठीक पहले संगठन के पदाधिकारियों की नाराजगी पार्टी के लिए चुनौती बन सकती है, क्योंकि स्थानीय चुनावों में मंडल और बूथ स्तर का संगठन महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हालांकि, इस्तीफे के पीछे के सभी कारणों और पार्टी की ओर से इस पर आगे की कार्रवाई को लेकर विस्तृत जानकारी का इंतजार है।
कांग्रेस में भी विरोध के सुर
निकाय चुनाव के टिकट वितरण के दौरान कांग्रेस में भी विरोध का मामला सामने आया। जयपुर में कांग्रेस शहर अध्यक्ष सुनील शर्मा का पुतला फूंके जाने की जानकारी सामने आई है। इससे संकेत मिलता है कि उम्मीदवार चयन को लेकर दोनों प्रमुख दलों में असंतोष मौजूद है। टिकट के दावेदारों और समर्थकों की नाराजगी अब चुनाव प्रचार के दौरान पार्टी के लिए चुनौती बन सकती है। दोनों दलों के सामने बागी उम्मीदवारों और असंतुष्ट कार्यकर्ताओं को साधने की जिम्मेदारी होगी।
चुनाव से पहले डैमेज कंट्रोल की चुनौती
नगर निकाय चुनाव में टिकट वितरण के बाद सामने आई नाराजगी ने बीजेपी और कांग्रेस दोनों के सामने डैमेज कंट्रोल की चुनौती खड़ी कर दी है। स्थानीय चुनावों में टिकट से वंचित दावेदार निर्दलीय चुनाव लड़ सकते हैं या समर्थकों के जरिए पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार के खिलाफ माहौल बना सकते हैं। ऐसे में दोनों दलों की कोशिश होगी कि नाराज नेताओं और कार्यकर्ताओं को मनाकर संगठन को एकजुट रखा जाए। अब देखना होगा कि अंजलि गौतम सहित अन्य नाराज दावेदार पार्टी के फैसले को स्वीकार करते हैं या चुनावी मैदान में अलग रास्ता अपनाते हैं।