यमुना जल समझौते पर नया विवाद, हाईकोर्ट में MoA पेश नहीं होने पर उठे सवाल
राजस्थान और हरियाणा के बीच हाल ही में हुए यमुना जल समझौते (MoA) को लेकर एक बार फिर विवाद गहरा गया है। यमुना जल संघर्ष समिति के संयोजक और मामले के याचिकाकर्ता यशवर्धन सिंह शेखावत ने आरोप लगाया है कि राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में न तो नए समझौते की प्रति प्रस्तुत की और न ही परियोजना की ताजा प्रगति रिपोर्ट दाखिल की। उन्होंने इसे पारदर्शिता और जवाबदेही से जुड़ा गंभीर मुद्दा बताया है।
हाईकोर्ट में नए समझौते की प्रति पेश नहीं करने पर सवाल
याचिकाकर्ता यशवर्धन सिंह शेखावत ने कहा कि हालिया सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने हरियाणा के साथ हुए नए समझौते (MoA) का विवरण न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत नहीं किया। उनका कहना है कि यदि सरकार परियोजना को लेकर गंभीर है तो उसे अदालत को यह बताना चाहिए था कि नए समझौते में कौन-कौन सी शर्तें शामिल हैं, अब तक क्या प्रगति हुई है और निर्माण कार्य कब शुरू होगा। उनके अनुसार इन बिंदुओं पर कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई, जिससे पूरे मामले में पारदर्शिता को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं।
पहले के समझौते को लेकर भी जताई आपत्ति
शेखावत ने आरोप लगाया कि इससे पहले फरवरी 2024 में हुए समझौते को भी लंबे समय तक सार्वजनिक नहीं किया गया था। उनका दावा है कि बाद में सामने आए दस्तावेजों में ऐसी शर्तें थीं, जिनके अनुसार हरियाणा की वेस्टर्न यमुना कैनाल की पूरी क्षमता उपयोग होने के बाद ही राजस्थान को पानी उपलब्ध कराया जाना था। उन्होंने कहा कि यह व्यवस्था वर्ष 1994 के मूल यमुना जल बंटवारा समझौते की भावना के विपरीत प्रतीत होती है, जिसमें राज्यों के बीच अनुपातिक आधार पर जल वितरण का प्रावधान बताया गया था।
29 जून के नए MoA को सार्वजनिक करने की मांग
याचिकाकर्ता ने यह भी दावा किया कि 29 जून 2026 को राजस्थान और हरियाणा के बीच एक नया MoA हुआ, लेकिन उसकी प्रति न तो सार्वजनिक की गई और न ही न्यायालय के समक्ष रखी गई। उनका कहना है कि यदि समझौते में राजस्थान के हित सुरक्षित हैं तो सरकार को इसे सार्वजनिक करने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। उन्होंने मांग की कि नए समझौते की प्रमाणित प्रति सार्वजनिक की जाए ताकि परियोजना से जुड़े सभी तथ्य लोगों और अदालत के सामने स्पष्ट हो सकें।
32 वर्षों बाद भी परियोजना अधूरी होने का दावा
यशवर्धन सिंह शेखावत का कहना है कि यमुना जल परियोजना से जुड़े क्षेत्र के लोगों को तीन दशक से अधिक समय बाद भी अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाया है। उन्होंने दावा किया कि वर्ष 2017 में जनहित याचिका दायर होने के बाद न्यायालय की निगरानी में परियोजना से जुड़ी प्रशासनिक प्रक्रियाओं में कुछ प्रगति हुई, लेकिन अब तक निर्माण कार्य शुरू नहीं हो सका। उनका कहना है कि इससे क्षेत्र के लोगों को लंबे समय से अपने वैधानिक जल अधिकार का इंतजार करना पड़ रहा है।
सरकार पर राजनीतिक प्रचार के आरोप, आधिकारिक पक्ष का इंतजार
याचिकाकर्ता ने राज्य सरकार पर आरोप लगाया कि परियोजना को लेकर लगातार घोषणाएं और समझौतों का प्रचार किया जाता है, लेकिन न्यायालय में विस्तृत जानकारी और दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए जाते। उन्होंने हाईकोर्ट से मामले की नियमित निगरानी जारी रखने तथा सरकार से विस्तृत प्रगति रिपोर्ट और निर्माण कार्य की समयसीमा शपथपत्र के साथ प्रस्तुत कराने की मांग की है। फिलहाल इन आरोपों पर राज्य सरकार की ओर से विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आना बाकी है। ऐसे में अब सभी की नजर हाईकोर्ट की अगली सुनवाई और सरकार के अगले कदम पर बनी हुई है।