“एक करोड़ का इनामी नक्सली कमांडर हिडमा ढेर — संघर्ष की नई मोड़”
नक्सलवाद के बस्तर इलाकों में लंबे समय से घातक आतंक फैलाने वाले माओवादी कमांडर माड़वी हिडमा को सुरक्षा बलों ने तीन-राज्यों के जंगलों में मुठभेड़ में ढेर कर दिया है। वह करीब 26 बड़े और खतरनाक हमलों का मास्टरमाइंड था, जिस पर सरकार ने एक करोड़ रुपये तक का इनाम रखा था। आइए जानते हैं इस एनकाउंटर की पूरी कहानी, हिडमा की नियति और इसके नक्सल आंदोलन पर पड़ने वाले गहरे प्रभाव का विश्लेषण।
हिडमा मारा गया
सुरक्षा बलों ने 18 नवंबर 2025 को आंध्र प्रदेश-छत्तीसगढ़-तेलंगाना त्रिसंधि क्षेत्र के मारेदुमिल्ली जंगल में माड़वी हिडमा और उसकी पत्नी राजे समेत चार अन्य नक्सलियों को मुठभेड़ में मार गिराया।
एनकाउंटर की पुष्टि के बाद गृह मंत्री अमित शाह ने सुरक्षाबलों को बधाई दी है।
वो कौन था — हिडमा की पहचान और इतिहास ,नक्सल आंदोलन का रणनीतिक दिमाग
माड़वी हिडमा (उर्फ संतोष, हिड्मालु) PLGA (People’s Liberation Guerrilla Army) की बटालियन नंबर 1 के प्रमुख थे, जिसे माओवादी हमले करने वाली एक सबसे घातक इकाई माना जाता था।
वह CPI (माओवादी) की केंद्रीय कमेटी में शामिल थे और बस्तर-क्षेत्र के आदिवासी कमांडरों में उनकी खासी पकड़ थी।
इन पर कम से कम 26 बड़े नक्सल हमलों का आरोप था, जिनमें दंतेवाड़ा (2010), झीरम घाटी नरसंहार (2013), और सुकमा-बीजापुर (2021) जैसे घातक हमले शामिल हैं।
इनाम कितना था और क्यों?
हिडमा की गतिविधियों की गंभीरता को देखते हुए उस पर एक करोड़ रुपये का इनाम घोषित किया गया था।
ऐसा इनाम न सिर्फ उसकी ‘दहशत फैलाने वाली शक्ति’ का संकेत था, बल्कि यह भी दर्शाता था कि सुरक्षा एजेंसियां उसे पकड़ने या उसे खात्मा करने के लिए कितनी गंभीर थीं।
हमलों की लंबी फेहरिस्त ,26 हमले — जानलेवा रणनीति
हिडमा ने दशकों में नक्सल ऑपरेशन की रणनीति बनाई और उसे क्रियान्वित किया।
इन हमलों में सुरक्षा बलों को बड़ा नुकसान हुआ — अनुमानित तौर पर 150 से अधिक जवान मारे गए।
उसके सैन्य नेतृत्व और रणनीतिक कल्पना ने माओवादी ड्राइव को बहुत संगठित और खौफनाक बना दिया था।
इस सफलता का मतलब — नक्सल आंदोलन पर असर
हिडमा का खात्मा नक्सलवाद के लिए एक बड़ा झटका है। उसकी मौत सुरक्षा बलों की रणनीतिक बुद्धिमत्ता और खुफिया कामयाबी का प्रतीक है।
इससे PLGA-1 बटालियन की क्षमता कमजोर हो सकती है, खासतौर पर क्योंकि हिडमा उनकी नीतियों और हमलों का रणनीतिक मस्तिष्क था।
हालांकि, नक्सली आंदोलन जड़ में बहुत बड़ा और विस्तार में था — सिर्फ एक कमांडर की मौत पूरी लड़ाई का अंत नहीं कर सकती। फिर भी यह एक संकेत है कि सरकार नक्सलवाद को जड़ से समाप्त करने में गंभीर है।
गृह मंत्री अमित शाह द्वारा लगाई गई 30 नवंबर 2025 की डेडलाइन को देखते हुए, यह ऑपरेशन नक्सल विरोधी अभियान की नई रणनीति का हिस्सा माना जा सकता है।
सुरक्षा बलों को अब हिडमा के स्थानापन्न कमांडरों पर कड़ी नजर रखनी होगी, ताकि उनकी गैर मौजूदगी का फायदा न उठाया जाए।
एनकाउंटर के बाद ऑपरेशन्स में तेजी और जाँच बढ़ सकती है — खासकर उन क्षेत्रों में जहाँ हिडमा का प्रभुत्व था।
सामाजिक-आर्थिक विकास को बढ़ावा देना जरूरी होगा: आदिवासी इलाकों में स्थानीय जनता का भरोसा जीतना नक्सल आतंक को सख्त लड़ाई में कमजोर कर सकता है।
साथ ही, पुनर्संगठन की चुनौतियाँ नक्सल संगठन के भीतर नेतृत्व के नए रूपों को जन्म दे सकती हैं — क्या नई पीढ़ी उनके विचारों को आगे ले जानी चाहेंगे या फेरबदल होगा, यह देखना अहम होगा।
हिडमा का खात्मा नक्सलवाद के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ है —
यह न सिर्फ सुरक्षा बलों की बड़ी कामयाबी है, बल्कि मध्य-भारत में लंबे समय से जारी इस विद्रोह के प्रतीकात्मक अंत की ओर एक कदम भी। हालांकि पूरी लड़ाई खत्म नहीं हुई है, पर यह घटना निश्चित ही नक्सल विरोधी अभियान को नए आत्मविश्वास और दिशा देने वाली है।