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कर्नाटक सत्ता संग्राम तेज: CM बदलने की अटकलों के बीच C-Voter सर्वे ने बढ़ाया सियासी तनाव

कर्नाटक में कांग्रेस सरकार के भीतर शक्ति-संतुलन एक बार फिर हिलता हुआ दिखाई दे रहा है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और डिप्टी सीएम डी.के. शिवकुमार के बीच खींचतान अब बंद कमरों से निकलकर खुले सियासी मैदान में महसूस की जाने लगी है। इसी बीच C-Voter का नया सर्वे सामने आया है, जिसने यह भी बता दिया कि राज्य की जनता किस नेता को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर देखना चाहती है। सर्वे के आंकड़े हालत को और पेचीदा बना रहे हैं।

सत्ता संघर्ष का नया दौर—अटकलों ने बढ़ाई हलचल

कर्नाटक में मुख्यमंत्री बदलने की चर्चाएं कई हफ्तों से सियासत को गर्म किए हुए हैं। कांग्रेस नेतृत्व भले ही बदलाव से इंकार करता रहा हो, लेकिन पार्टी के भीतर असहजता साफ देखी जा सकती है। गुरुवार को हालात तब और दिलचस्प हो गए जब एक बार फिर सिद्धारमैया और शिवकुमार गुटों के बीच तनातनी की खबरें तेज हुईं। यह पूरा विवाद सत्ता के समीकरण और भविष्य की नेतृत्व पोजिशनिंग से जुड़ा माना जा रहा है।


यह शक्ति-संघर्ष सिर्फ दो नेताओं की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा नहीं, बल्कि कांग्रेस के संगठनात्मक ढांचे और भविष्य के चुनावी गणित से जुड़ा हुआ है। दोनों नेताओं का राज्य में बड़ा जनाधार है, ऐसे में पार्टी हाईकमान भी खुलकर किसी एक पक्ष में खड़ा होने से बच रहा है।

कांग्रेस हाईकमान की दुविधा—दो मजबूत चेहरे, एक कुर्सी

सिद्धारमैया बतौर सीएम सरकार चला रहे हैं और उनका प्रशासनिक अनुभव पार्टी की ताकत माना जाता है। दूसरी ओर, डीके शिवकुमार लंबे समय से कर्नाटक में कांग्रेस के संगठनात्मक स्तंभ माने जाते हैं और उनके समर्थक लगातार सत्ता परिवर्तन की मांग उठा रहे हैं।
हाईकमान दोनों नेताओं को साधे रखने की कोशिश में है, लेकिन हर बार विवाद किसी न किसी बहाने सतह पर उभर आता है।

कांग्रेस के लिए यह स्थिति दोधारी तलवार जैसी है—यदि सिद्धारमैया को हटाया गया तो उनका समर्थन आधार नाराज हो सकता है, और यदि शिवकुमार को मौका नहीं मिला तो उनका गुट अगले चुनावों में निष्क्रिय हो सकता है।

C-Voter सर्वे का बड़ा खुलासा—जनता किसे चाहती है CM?

इसी सत्ता संघर्ष के बीच आए C-Voter सर्वे ने राजनीतिक तापमान और बढ़ा दिया है। सर्वे बताता है कि राज्य की बड़ी आबादी अभी भी सिद्धारमैया को मुख्यमंत्री के रूप में पसंद कर रही है, जबकि शिवकुमार की लोकप्रियता भी दूसरे नंबर पर मजबूत बनी हुई है।
सर्वे के रुझान बताते हैं कि जनता फिलहाल नेतृत्व में स्थिरता चाहती है, न कि अचानक राजनीतिक बदलाव।

जनता की पसंद में सिद्धारमैया की बढ़त कांग्रेस नेतृत्व के फैसले पर बड़ा मनोवैज्ञानिक प्रभाव डाल सकती है। शिवकुमार के लिए यह संकेत है कि उन्हें अभी और समय लग सकता है, लेकिन उनका जनाधार लगातार मजबूत हो रहा है।

सियासी समीकरण बदलने के संकेत—2028 की तैयारी?

विशेषज्ञ मानते हैं कि यह खींचतान सिर्फ वर्तमान सत्ता के लिए नहीं, बल्कि 2028 के विधानसभा चुनाव की भूमिका भी तय कर रही है। दोनों नेता अपने-अपने गुट को सशक्त बनाने में जुटे हैं।
राज्य की राजनीति में यह संघर्ष आगे चलकर कांग्रेस के भीतर बड़े बदलाव की जमीन तैयार कर सकता है।

यदि पार्टी आने वाले महीनों में नेतृत्व परिवर्तन का जोखिम लेती है, तो यह निर्णय सीधे चुनावी रणनीति पर असर डालेगा। वहीं यदि स्थिति ऐसे ही खिंचती रही तो गुटबाजी सरकार की स्थिरता पर असर डाल सकती है।

आगे क्या? — हाईकमान पर बढ़ा दबाव

कर्नाटक में चल रहा सत्ता-संघर्ष कांग्रेस हाईकमान के लिए सिरदर्द साबित हो रहा है। संगठन एक तरफ सरकार की स्थिरता चाहता है और दूसरी ओर मजबूत नेता शिवकुमार को नज़रअंदाज़ भी नहीं कर सकता।
सर्वे के नतीजे आने के बाद हाईकमान को अब बेहद सोच-समझकर फैसला लेना होगा।

आने वाले हफ्ते कर्नाटक की सियासत के लिए निर्णायक हो सकते हैं। पार्टी को या तो एक मजबूत सामंजस्य बिंदु खोजना होगा या फिर नेतृत्व पुनर्गठन का साहसी कदम उठाना होगा।

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