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इजरायल चुनाव 2026: गाजा युद्ध के बाद क्या सत्ता बचा पाएंगे नेतन्याहू? कल होगा फैसला

नई दिल्ली/यरुशलम: इजरायल में मंगलवार, 27 अक्टूबर 2026 को आम चुनाव होने जा रहे हैं। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के राजनीतिक भविष्य के लिहाज से यह चुनाव बेहद अहम माना जा रहा है। 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले और उसके बाद गाजा में चले युद्ध के बाद यह पहला राष्ट्रीय चुनाव है। मतदाता नेतन्याहू सरकार के सुरक्षा रिकॉर्ड, युद्ध संबंधी फैसलों और घरेलू नीतियों पर अपनी राय जाहिर करेंगे। हालांकि, चुनाव में सबसे ज्यादा सीटें जीतना ही सत्ता की गारंटी नहीं होगा। इजरायल की संसदीय व्यवस्था में सरकार बनाने के लिए 120 सदस्यीय नेसेट में कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जरूरी है। ताजा आकलनों के अनुसार, नेतन्याहू और विपक्षी खेमे के बीच मुकाबला कड़ा है और किसी भी पक्ष को स्पष्ट बहुमत मिलने की गारंटी नहीं है।

27 अक्टूबर को होगा मतदान, नेसेट की सभी 120 सीटों पर चुनाव

इजरायल में मंगलवार को संसद के 120 सदस्यों के चुनाव के लिए मतदान होगा। देश की संसद को नेसेट कहा जाता है। चुनाव की तारीख 27 अक्टूबर तय की गई है। यह मतदान 2022 के बाद पहला राष्ट्रीय चुनाव होगा और हमास के 7 अक्टूबर 2023 के हमले के बाद जनता को सरकार के प्रदर्शन पर राय देने का अवसर देगा। इजरायल में चुनाव के दिन सार्वजनिक अवकाश रहता है। मतदान का समय आम तौर पर सुबह 7 बजे से रात 10 बजे तक होता है। कुछ छोटे मतदान केंद्रों और विशेष संस्थानों में समय अलग हो सकता है।मतदान में 18 वर्ष या उससे अधिक उम्र के पात्र नागरिक हिस्सा लेते हैं। इजरायल में मतदाता सीधे प्रधानमंत्री का चुनाव नहीं करते, बल्कि राजनीतिक दलों की सूची को वोट देते हैं। इसके बाद संसद में दलों की सीटों के आधार पर सरकार बनाने की प्रक्रिया शुरू होती है।

नेतन्याहू के लिए क्यों अहम है यह चुनाव?

बेंजामिन नेतन्याहू इजरायल के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने वाले नेता हैं। उन्होंने कई बार सत्ता में वापसी की है और देश की राजनीति में लंबे समय से प्रभावशाली भूमिका निभाई है। लेकिन 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले के बाद देश की सुरक्षा व्यवस्था और सरकार की तैयारियों को लेकर उन पर सवाल उठे।गाजा में लंबे समय तक चले युद्ध और उसके व्यापक मानवीय प्रभावों ने भी इजरायल की घरेलू और अंतरराष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित किया है। इसके अलावा, ईरान और क्षेत्रीय संघर्षों से जुड़े सुरक्षा मुद्दे भी चुनावी बहस में अहम हैं।नेतन्याहू के समर्थक उन्हें सुरक्षा के मामले में अनुभवी नेता मानते हैं। उनका तर्क है कि क्षेत्रीय खतरों का सामना करने के लिए मजबूत नेतृत्व जरूरी है। दूसरी ओर, आलोचक 7 अक्टूबर के हमले से पहले और बाद की सुरक्षा संबंधी चूकों, युद्ध के संचालन और सरकार की नीतियों पर सवाल उठाते हैं। चुनाव का परिणाम इन अलग-अलग दृष्टिकोणों के बीच मतदाताओं के रुख का संकेत देगा।

इजरायल में चुनाव कैसे होता है?

इजरायल में आनुपातिक प्रतिनिधित्व की व्यवस्था है। इसका मतलब है कि मतदाता किसी एक उम्मीदवार के बजाय राजनीतिक पार्टी या चुनावी सूची को वोट देते हैं। देशभर में किसी पार्टी को मिले वोटों के अनुपात के आधार पर नेसेट में उसकी सीटें तय होती हैं।संसद में प्रतिनिधित्व पाने के लिए किसी पार्टी या चुनावी सूची को कुल वैध वोटों में से कम से कम 3.25 प्रतिशत वोट हासिल करने होते हैं। इस सीमा को पार करने के बाद सीटों का बंटवारा चुनावी व्यवस्था के नियमों के अनुसार किया जाता है। इस व्यवस्था के कारण कई पार्टियां संसद में पहुंच सकती हैं। किसी एक पार्टी के लिए अकेले बहुमत हासिल करना कठिन रहता है। इसलिए चुनाव के बाद सरकार बनाने के लिए विभिन्न दलों के बीच बातचीत और गठबंधन अहम भूमिका निभाते हैं।

सरकार बनाने के लिए 61 सांसदों का समर्थन जरूरी

इजरायल की संसद में कुल 120 सीटें हैं। सरकार बनाने के लिए किसी नेता को कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जुटाना होता है। सबसे ज्यादा सीटें जीतने वाली पार्टी के नेता को प्रधानमंत्री बनने का स्वतः अधिकार नहीं मिल जाता। उसे यह साबित करना होता है कि वह बहुमत का समर्थन हासिल कर सकता है।चुनाव के बाद राष्ट्रपति राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों से विचार-विमर्श करते हैं। इसके बाद किसी सांसद को सरकार बनाने की जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है। उस नेता को गठबंधन सहयोगियों से बातचीत करके सरकार बनाने और संसद का समर्थन हासिल करने की कोशिश करनी होती है।यदि कोई नेता निर्धारित प्रक्रिया में सरकार बनाने में सफल नहीं होता, तो दूसरे नेता को अवसर दिया जा सकता है। बातचीत के बाद भी बहुमत नहीं बनने की स्थिति में राजनीतिक गतिरोध पैदा हो सकता है और नए चुनाव की नौबत आ सकती है। इसलिए इस चुनाव में केवल सीटों की संख्या नहीं, बल्कि चुनाव के बाद बनने वाले गठबंधनों का समीकरण भी महत्वपूर्ण रहेगा।

बेंजामिन नेतन्याहू और लिकुड पार्टी

नेतन्याहू की पार्टी लिकुड दक्षिणपंथी राजनीति का प्रमुख चेहरा है। उनके साथ धार्मिक और दक्षिणपंथी दलों का गठबंधन भी रहा है। इनमें शास, यूनाइटेड टोरा जूडिज्म, धार्मिक जायनिज्म और ओत्जमा येहुदित जैसी पार्टियां शामिल हैं।इन दलों का समर्थन नेतन्याहू के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। लेकिन गठबंधन के भीतर भी कुछ मुद्दों पर मतभेद हैं। इनमें अति-रूढ़िवादी यहूदी समुदाय के लोगों को अनिवार्य सैन्य सेवा से मिलने वाली छूट का मुद्दा खास है। युद्ध के दौरान सैन्य सेवा और उसके बोझ को लेकर यह बहस और तेज हुई है।नेतन्याहू को घरेलू भ्रष्टाचार के मामलों का भी सामना करना पड़ रहा है। वह इन आरोपों से इनकार करते हैं। इसके अलावा, गाजा युद्ध और सुरक्षा नीति को लेकर उनकी सरकार की आलोचना होती रही है। चुनाव में इन सभी मुद्दों का असर देखने को मिल सकता है।

गादी आइजेनकोट विपक्ष के प्रमुख दावेदार

नेतन्याहू को चुनौती देने वाले प्रमुख नेताओं में पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइजेनकोट शामिल हैं। वह याशार नाम की पार्टी का नेतृत्व कर रहे हैं। उनकी छवि सुरक्षा मामलों का अनुभव रखने वाले नेता की है।आइजेनकोट के परिवार को भी गाजा युद्ध में नुकसान उठाना पड़ा। उनके बेटे की युद्ध के दौरान मौत हो गई थी। इस व्यक्तिगत अनुभव और सैन्य पृष्ठभूमि का उल्लेख उनके राजनीतिक संदेश में भी किया जाता है।वह नेतन्याहू सरकार के सुरक्षा रिकॉर्ड और नेतृत्व पर सवाल उठाते रहे हैं। विपक्षी खेमे में उन्हें एक ऐसे विकल्प के रूप में पेश किया जा रहा है, जो सुरक्षा के मुद्दों पर सख्त रुख रखते हुए सरकार की जवाबदेही पर जोर देता है। हालांकि, चुनाव के बाद उन्हें सरकार बनाने के लिए दूसरे दलों का समर्थन जुटाना होगा।

नफ्ताली बेनेट और यायर लैपिड का गठबंधन

पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट और यायर लैपिड भी नेतन्याहू के विरोधी खेमे के अहम चेहरे हैं। दोनों नेताओं की विचारधारा पूरी तरह समान नहीं है, लेकिन वे नेतन्याहू को सत्ता से हटाने के उद्देश्य से साथ आए हैं।बेनेट दक्षिणपंथी पृष्ठभूमि के नेता हैं, जबकि लैपिड मध्यमार्गी राजनीति का प्रतिनिधित्व करते हैं। दोनों पहले भी गठबंधन सरकार में साथ काम कर चुके हैं। उनके गठबंधन का संदेश युद्ध और राजनीतिक विभाजन से जूझ रहे देश को फिर से एकजुट करने पर केंद्रित है।लेकिन विपक्ष के सामने चुनौती यह है कि अलग-अलग विचारधारा वाले दलों को चुनाव के बाद एक साझा सरकार के लिए सहमत किया जाए। यदि किसी एक खेमे को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता, तो गठबंधन की बातचीत ही सत्ता का रास्ता तय कर सकती है।

एविगडोर लिबरमैन और यायर गोलान भी मुकाबले में

पूर्व रक्षा मंत्री एविगडोर लिबरमैन भी नेतन्याहू के प्रमुख आलोचकों में शामिल हैं। उनकी पार्टी यिसराइल बेतेनु को खास तौर पर पूर्व सोवियत संघ से इजरायल आए लोगों के बीच समर्थन मिलता रहा है। लिबरमैन सुरक्षा के मुद्दों पर सख्त रुख के लिए जाने जाते हैं, लेकिन उन्होंने नेतन्याहू की नीतियों की आलोचना भी की है।दूसरी ओर, पूर्व सैन्य जनरल यायर गोलान डेमोक्रेट्स पार्टी का नेतृत्व कर रहे हैं। उनकी पार्टी वामपंथी और श्रमवादी राजनीतिक परंपरा से जुड़ी है। गोलान ने 7 अक्टूबर के हमले के दौरान लोगों को बचाने के लिए की गई अपनी भूमिका के कारण भी पहचान बनाई।इन नेताओं के बीच चुनावी मुकाबला केवल नेतन्याहू के खिलाफ समर्थन जुटाने तक सीमित नहीं है। विपक्षी दलों को अपनी अलग-अलग नीतियों और मतदाता आधार को साथ लेकर चलना होगा।

अरब दलों और छोटी पार्टियों की भूमिका हो सकती है निर्णायक

इजरायल की राजनीति में अरब नागरिकों का प्रतिनिधित्व करने वाले दल भी अहम भूमिका निभा सकते हैं। इनमें राम और जॉइंट लिस्ट जैसे राजनीतिक समूह शामिल हैं। इनके अलावा कुछ छोटी पार्टियां भी चुनावी समीकरण प्रभावित कर सकती हैं।यदि नेतन्याहू और विपक्षी खेमे में से कोई भी 61 सीटों का समर्थन नहीं जुटा पाता, तो छोटे दलों की सीटें सरकार बनाने की बातचीत में महत्वपूर्ण हो सकती हैं। हालांकि, मुख्यधारा के कई यहूदी विपक्षी दल अरब पार्टियों के साथ औपचारिक गठबंधन को लेकर सीमाएं रखते हैं। इससे सरकार गठन की प्रक्रिया और जटिल हो सकती है।

चुनाव के नतीजे कब आएंगे?

मतदान 27 अक्टूबर को होगा। उपलब्ध चुनावी कार्यक्रम के अनुसार, आधिकारिक परिणाम 4 नवंबर के आसपास आने की उम्मीद है। शुरुआती रुझान और सीटों का अनुमान पहले सामने आ सकते हैं, लेकिन अंतिम नतीजों के लिए आधिकारिक घोषणा का इंतजार करना होगा।यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि चुनाव परिणाम आने के तुरंत बाद नई सरकार बनना तय नहीं है। यदि किसी खेमे को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता, तो गठबंधन वार्ताओं में समय लग सकता है। ऐसे में अगला प्रधानमंत्री कौन होगा, यह केवल मतदान के परिणाम से नहीं, बल्कि 61 सांसदों का समर्थन जुटाने की क्षमता से भी तय होगा।

नेतन्याहू की सत्ता का फैसला सिर्फ वोटों से नहीं, गठबंधन से भी

इजरायल का यह चुनाव नेतन्याहू सरकार के सुरक्षा रिकॉर्ड, गाजा युद्ध, सैन्य सेवा संबंधी नीतियों और घरेलू राजनीतिक विवादों पर जनमत का महत्वपूर्ण संकेत होगा। हालांकि, चुनाव से पहले किसी भी नेता की जीत या हार तय मानना सही नहीं होगा।यदि नेतन्याहू का गठबंधन 61 सीटों का समर्थन जुटा लेता है, तो वह सत्ता में बने रहने की स्थिति में होंगे। वहीं, विपक्षी दल पर्याप्त समर्थन जुटाने में सफल होते हैं, तो सत्ता परिवर्तन का रास्ता खुल सकता है। लेकिन यदि संसद में स्पष्ट बहुमत नहीं बनता, तो लंबी गठबंधन वार्ता या राजनीतिक गतिरोध भी संभव है।इसलिए असली सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कौन-सी पार्टी सबसे ज्यादा सीटें जीतेगी। निर्णायक सवाल यह होगा कि चुनाव के बाद कौन-सा नेता नेसेट में बहुमत का समर्थन हासिल कर पाता है।


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