‘अमेरिका पर भरोसा नहीं’, गालिबाफ की दो-टूक; समझौता टूटा तो कड़ा जवाब देने की चेतावनी
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच ईरान ने अमेरिका को एक बार फिर सख्त संदेश दिया है। ईरानी संसद (मजलिस) के अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबाफ ने कहा है कि यदि अमेरिका पिछले महीने हुए समझौते (मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग) से पीछे हटता है, तो ईरान पूरी ताकत के साथ जवाब देने के लिए तैयार है। हालांकि, इस समझौते के विवरण और उसकी वर्तमान स्थिति को लेकर दोनों देशों के अलग-अलग दावे सामने आ रहे हैं।
‘अमेरिका पर भरोसा नहीं’
शुक्रवार को इंडोनेशिया की पीपुल्स कंसल्टेटिव असेंबली के अध्यक्ष अहमद मुजानी के साथ बैठक के दौरान गालिबाफ ने कहा कि ईरान को अमेरिका के वादों पर भरोसा नहीं है। उनके मुताबिक, अमेरिका का बातचीत के दौरान भी सैन्य कार्रवाई करने का इतिहास रहा है, इसलिए ईरान ने अपनी रक्षा तैयारियां कभी नहीं रोकी हैं।
गालिबाफ ने दावा किया कि उन्होंने बातचीत के दौरान अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस से भी स्पष्ट शब्दों में कहा था कि ईरान को अमेरिका पर भरोसा नहीं है और किसी भी वार्ता में वही देश सफल हो सकता है जो हर स्थिति के लिए तैयार हो।
समझौता टूटा तो देंगे जवाब
ईरानी नेता ने कहा कि उनका देश शांति चाहता है, लेकिन यदि अमेरिका किसी समझौते से पीछे हटता है या आक्रामक कदम उठाता है, तो ईरान उसका मजबूती से जवाब देगा। उन्होंने कहा कि ईरान अपने राष्ट्रीय हितों और अधिकारों की रक्षा के लिए हर आवश्यक कदम उठाने को तैयार है।
ट्रंप के बयान से बढ़ी सियासी गर्मी
दूसरी ओर, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में कहा कि अमेरिका बातचीत के लिए तैयार है, लेकिन दोनों देशों के बीच पहले लागू संघर्ष-विराम को अब प्रभावी नहीं माना जा रहा। ट्रंप के इस बयान के बाद दोनों देशों के बीच तनाव को लेकर नई अटकलें तेज हो गई हैं।
होर्मुज के बाद बढ़ा तनाव
हाल के दिनों में होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों पर हुए हमलों के बाद अमेरिका और ईरान के बीच तनाव काफी बढ़ गया। इसके बाद अमेरिका ने ईरान में हवाई हमले किए, जबकि ईरान ने जवाबी कार्रवाई में खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाने का दावा किया। इन घटनाओं ने पूरे पश्चिम एशिया में सुरक्षा चिंताओं को बढ़ा दिया है।
क्या आगे बढ़ेगी बातचीत?
तनावपूर्ण माहौल के बावजूद दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संपर्क पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं। विश्लेषकों का मानना है कि यदि वार्ता जारी रहती है, तो क्षेत्र में हालात सामान्य करने की संभावना बनी रह सकती है। वहीं, किसी भी नए सैन्य कदम से संघर्ष और गहरा सकता है।