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ईरान पर UNHRC की इमरजेंसी बैठक: जिनेवा में आज बड़ा फैसला संभव


ईरान में लगातार बिगड़ते मानवाधिकार हालात को लेकर अंतरराष्ट्रीय चिंता अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचती दिख रही है. संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) ने 23 जनवरी 2026 को ईरान पर एक आपात सत्र बुलाया है. जिनेवा में होने वाली इस बैठक से ईरान पर वैश्विक दबाव और कड़े कदमों के संकेत मिल रहे हैं.


क्यों बुलाई गई UNHRC की आपात बैठक?

UNHRC के नियमों के अनुसार, परिषद के 47 सदस्य देशों में से कम से कम 16 देशों का समर्थन मिलने पर आपात सत्र बुलाया जा सकता है. ईरान के मामले में यह संख्या कहीं ज्यादा रही. अब तक 21 सदस्य देशों ने विशेष सत्र के प्रस्ताव का समर्थन कर दिया है.

फ्रांस, जापान, इटली, स्विट्जरलैंड, नीदरलैंड्स और स्पेन जैसे देशों का समर्थन इस बात का संकेत है कि ईरान के मानवाधिकार रिकॉर्ड को लेकर पश्चिमी देशों में गंभीर असंतोष है.


पर्यवेक्षक देशों का भी मजबूत समर्थन

सिर्फ सदस्य देश ही नहीं, बल्कि परिषद में मौजूद 30 पर्यवेक्षक देशों ने भी इस विशेष सत्र का समर्थन किया है. कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, नॉर्वे, स्वीडन, जर्मनी और यूक्रेन जैसे देशों की सहमति से यह साफ हो गया है कि ईरान पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निगरानी और कार्रवाई की मांग तेज हो रही है.


बैठक कहां और कब होगी?

यह आपात बैठक स्विट्जरलैंड के जिनेवा स्थित पैले दे नेशन्स में आयोजित की जाएगी. भारतीय समयानुसार यह सत्र शाम 6:30 बजे शुरू होगा. बैठक का सीधा प्रसारण संयुक्त राष्ट्र की सभी आधिकारिक भाषाओं में किया जाएगा, जिससे पूरी दुनिया इसकी कार्यवाही पर नजर रख सकेगी.


2022 में भी ईरान पर बुलाया गया था विशेष सत्र

UNHRC अधिकारियों के अनुसार, परिषद की स्थापना के बाद यह 39वां विशेष सत्र होगा. इससे पहले 24 नवंबर 2022 को ईरान में महिलाओं और बच्चों के अधिकारों को लेकर आपात बैठक हुई थी. उस समय महसा अमीनी की मौत के बाद हुए प्रदर्शनों और सरकारी कार्रवाई ने वैश्विक चिंता को जन्म दिया था.


आज के सत्र से क्या निकल सकता है?

विशेष सत्र में ईरान के मानवाधिकार उल्लंघनों पर रिपोर्ट पेश की जा सकती है. इसके साथ ही स्वतंत्र जांच तंत्र, निगरानी मिशन या अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ाने वाले प्रस्तावों पर चर्चा संभव है. हालांकि अंतिम फैसला सदस्य देशों की सहमति पर निर्भर करेगा.


ईरान पर UNHRC की यह आपात बैठक सिर्फ एक कूटनीतिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि मानवाधिकारों को लेकर वैश्विक समुदाय की बढ़ती बेचैनी का संकेत है. जिनेवा में होने वाला यह सत्र ईरान के लिए आने वाले दिनों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ी चुनौती बन सकता है.

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