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भारत बना AI रेस का बड़ा खिलाड़ी: ट्रंप के विज्ञान सलाहकार बोले—अमेरिकी AI रणनीति में भारत की भूमिका बेहद अहम


आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की वैश्विक दौड़ में भारत को बड़ी मान्यता मिली है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के शीर्ष विज्ञान सलाहकार माइकल क्रैटसिओस ने भारत को “टेक्नोलॉजी पावरहाउस” बताते हुए कहा है कि व्हाइट हाउस की AI रणनीति को सफल बनाने में भारत की साझेदारी बेहद महत्वपूर्ण है। यह बयान ऐसे समय आया है जब दुनिया AI नेतृत्व को लेकर नई भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में प्रवेश कर चुकी है।


🟥 भारत को बताया टेक्नोलॉजी महाशक्ति

व्हाइट हाउस के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी नीति कार्यालय के निदेशक माइकल क्रैटसिओस ने एक इंटरव्यू में कहा कि भारत तेजी से उभरती तकनीकी ताकत है।

उन्होंने भारत की इंजीनियरिंग प्रतिभा, विशाल टेक टैलेंट पूल और तेजी से विकसित हो रहे स्टार्टअप व एप्लिकेशन इकोसिस्टम की खुलकर सराहना की।

अमेरिका की ओर से इस तरह की सार्वजनिक प्रशंसा यह संकेत देती है कि AI सहयोग अब केवल व्यापार नहीं बल्कि रणनीतिक साझेदारी बन चुका है।


🟥 इंडिया AI समिट के बाद बदली वैश्विक धारणा

हाल ही में इंडिया AI इम्पैक्ट समिट में भाग लेकर लौटे क्रैटसिओस ने कहा कि भारत हर साल बड़ी संख्या में इंजीनियर तैयार कर रहा है और घरेलू स्तर पर मजबूत तकनीकी क्षमता विकसित कर चुका है।

उन्होंने माना कि भारत केवल टेक सर्विसेज नहीं बल्कि अब AI उत्पाद और समाधान बनाने की दिशा में भी तेजी से आगे बढ़ रहा है।

यह बदलाव भारत को “आउटसोर्सिंग हब” से “इनोवेशन हब” की श्रेणी में ले जाता है।


🟥 AI का अगला चरण: ‘एजेंट सिस्टम’

क्रैटसिओस के अनुसार AI का अगला दौर ऐसे एजेंट सिस्टम का होगा जो आपस में संवाद कर सकें और मिलकर काम करें।

उन्होंने कहा कि इन सिस्टम्स के सुरक्षित संचालन के लिए वैश्विक मानकों की जरूरत होगी, जिस दिशा में अमेरिकी संस्थान NIST काम कर रहा है।

भविष्य का AI केवल चैटबॉट या ऐप नहीं बल्कि स्वायत्त डिजिटल सिस्टम्स का नेटवर्क होगा।


🟥 AI इन्फ्रास्ट्रक्चर सबसे बड़ी चुनौती

उन्होंने स्पष्ट किया कि AI विकसित करना महंगा है। इसके लिए डेटा सेंटर, सेमीकंडक्टर उत्पादन और ऊर्जा क्षमता जैसे बड़े निवेश जरूरी हैं।

अमेरिका इस क्षेत्र में वित्तीय सहयोग जुटाने के लिए डेवलपमेंट फाइनेंस कॉर्पोरेशन और एक्सपोर्ट-इंपोर्ट बैंक जैसे संस्थानों के जरिए साझेदार देशों की मदद कर रहा है।

AI प्रतिस्पर्धा अब केवल सॉफ्टवेयर नहीं बल्कि ऊर्जा, चिप निर्माण और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर की लड़ाई बन चुकी है।


🟥 ‘US Tech Corps’ योजना की घोषणा

क्रैटसिओस ने “यूएस टेक कॉर्प्स” पहल का भी उल्लेख किया। यह कार्यक्रम पीस कॉर्प्स की तरह होगा, लेकिन इसका फोकस तकनीकी सहयोग पर रहेगा।

तकनीकी विशेषज्ञ विभिन्न देशों में जाकर AI समाधान लागू करने में मदद करेंगे।

यह पहल अमेरिका की सॉफ्ट टेक्नोलॉजी डिप्लोमेसी का हिस्सा मानी जा रही है।


🟥 भारत-अमेरिका AI साझेदारी क्यों अहम?

उन्होंने कहा कि भारत लंबे समय से अमेरिका का मजबूत टेक पार्टनर रहा है। अमेरिकी बड़ी टेक कंपनियों के भारत में डेटा सेंटर और रिसर्च हब मौजूद हैं, जिससे दोनों देशों का सहयोग लगातार गहरा हो रहा है।

AI सहयोग भविष्य में रक्षा, अर्थव्यवस्था और डिजिटल शासन तक असर डाल सकता है।


🟥 विकसित बनाम विकासशील देशों की AI खाई

क्रैटसिओस ने चेतावनी दी कि AI अपनाने की गति विकसित और विकासशील देशों के बीच तेजी से अलग होती जा रही है।

यदि विकासशील देश स्वास्थ्य, शिक्षा, ऊर्जा, कृषि और सरकारी सेवाओं में AI को प्राथमिकता नहीं देंगे तो वे वैश्विक प्रतिस्पर्धा में पीछे छूट सकते हैं।

AI अब केवल तकनीक नहीं बल्कि आर्थिक विकास और वैश्विक शक्ति संतुलन का आधार बन रही है।


🟥 अमेरिकन AI एक्सपोर्ट्स प्रोग्राम क्या है?

व्हाइट हाउस “American AI Exports Program” के जरिए सहयोगी देशों को तकनीक, वित्तीय सहायता और कार्यान्वयन समर्थन देना चाहता है।

क्रैटसिओस ने कहा कि “वास्तविक AI स्वायत्तता” का मतलब है—देश अपनी जरूरतों के अनुसार सर्वोत्तम तकनीक का उपयोग करें और अपनी दिशा खुद तय करें।

यह कार्यक्रम वैश्विक AI इकोसिस्टम में अमेरिकी प्रभाव बढ़ाने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।


🟥 बड़ी तस्वीर: AI भू-राजनीति में भारत की एंट्री

अमेरिकी नेतृत्व द्वारा भारत को AI रणनीति का अहम साझेदार बताना दर्शाता है कि आने वाले दशक में भारत केवल टेक मार्केट नहीं बल्कि AI शक्ति संतुलन का प्रमुख स्तंभ बन सकता है।

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