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तीसरी बार सील हुआ ‘होटल देसी ठाठ’: कानून की आड़ में चल रही मनमानी पर फिर लगा ताला

अलवर के सिलीसेढ़ क्षेत्र में झील और सरिस्का बफर जोन की संवेदनशील ज़मीन पर खड़े ‘होटल देसी ठाठ’ की कहानी अब सिर्फ एक अवैध निर्माण की नहीं, बल्कि सिस्टम को बार-बार चुनौती देने की बन चुकी है। बिना भू-उपयोग परिवर्तन, बिना आवश्यक एनओसी और नियमों को ताक पर रखकर संचालित इस होटल पर एक बार फिर ताला जड़ दिया गया है।

मामला साफ है—सरिस्का बफर क्षेत्र और सिलीसेढ़ झील बांध के पेटे जैसे इको-सेंसिटिव इलाके में व्यावसायिक गतिविधियों पर सुप्रीम कोर्ट और एनजीटी की सख्त गाइडलाइन हैं। इन्हीं आदेशों के तहत 4 दिसंबर 2025 को नगर विकास न्यास (UIT) ने 10 अवैध प्रतिष्ठानों को सील किया था, जिनमें ‘देसी ठाठ’ भी शामिल था।

लेकिन इसके बाद जो हुआ, वह नियमों के साथ खुली आंखों से खिलवाड़ जैसा दिखता है।

होटल संचालक ने पहले एडीजे कोर्ट का दरवाजा खटखटाया—शादी-ब्याह की बुकिंग का हवाला देकर राहत मांगी कोर्ट ने दिसंबर तक होटल खोलने के आदेश दे दिए और होटल की सील खुल गई कोर्ट के इस निर्णय के खिलाफ UIT हाईकोर्ट पहुंचा, तो हाईकोर्ट ने निचली अदालत के आदेश को खारिज करते हुए फिर से सीलिंग का रास्ता साफ कर दिया।

इसके बाद भी कहानी खत्म नहीं हुई। संचालक जयपुर कंज्यूमर कोर्ट पहुंचा और एक बार फिर वही दलील—बुकिंग और नुकसान। कंज्यूमर कोर्ट ने आदेश देकर सील खुलवा दी, यहां तक कि मौके पर जाकर सील खोलने की करवाई गई।

यहीं से सवाल खड़े होते हैं—क्या कंज्यूमर कोर्ट का इस तरह के भूमि और पर्यावरणीय उल्लंघन वाले मामलों में अधिकार क्षेत्र बनता है?

UIT ने इस आदेश को भी हाईकोर्ट में चुनौती दी। 4 मई को हाईकोर्ट ने कंज्यूमर कोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी और स्टेट कमीशन की आगामी सुनवाई पर भी ब्रेक लगा दिया।

इसके बाद 4 मई की शाम नगर विकास न्यास की टीम सिलीसेढ़ झील पहुंची और तीसरी बार होटल को सील कर दिया। उस वक्त होटल में हरियाणा की एक पार्टी चल रही थी, विरोध भी हुआ, लेकिन प्रशासन ने देर रात तक कार्रवाई पूरी कर दी।

इस पूरी कार्रवाई में भूमि अवाप्ति अधिकारी जितेंद्र नरूका, ईआरओ मानवेंद्र जायसवाल, एईएन चांदनी, मेनका और कंवर सिंह मौजूद रहे।

यह मामला सिर्फ एक होटल का नहीं है—यह उस प्रवृत्ति का उदाहरण है, जहां बिना अनुमति निर्माण होता है पर्यावरणीय नियमों की अनदेखी की जाती है
और फिर अदालतों के अलग-अलग मंचों का इस्तेमाल कर बार-बार राहत ली जाती है

सिलीसेढ़ झील और सरिस्का का बफर जोन कोई आम जमीन नहीं है। यहां निर्माण का मतलब सीधे पर्यावरणीय संतुलन से खिलवाड़ है।

बार-बार सील खुलवाने की कोशिशें यह दिखाती हैं कि कुछ लोग कानून को प्रक्रिया नहीं, “रास्ता” समझते हैं—जहां से निकलने का कोई न कोई जुगाड़ मिल ही जाए।

नगर विकास न्यास ने भी इस बार साफ संकेत दिया है कि कार्रवाई आधी-अधूरी नहीं होगी। बार-बार सीलिंग करना बताता है कि दबावों के बावजूद विभाग पीछे हटने को तैयार नहीं है।

अब निगाहें अगली सुनवाई और इस पूरे मामले के अंतिम अंजाम पर हैं—क्या नियमों का राज कायम रहेगा या फिर “जुगाड़ तंत्र” एक बार फिर भारी पड़ेगा?

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