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800 साल पुरानी हायदोष परंपरा का भव्य जुलूस, तलवारों और तोपों की गूंज

अजमेर में मोहर्रम की 10वीं तारीख यानी आशूरा के मौके पर सदियों पुरानी ऐतिहासिक परंपरा ‘हायदोष’ को इस साल भी पूरे श्रद्धा और परंपरागत जोश के साथ निभाया गया। करीब 800 साल पुरानी इस रिवायत को आज भी उतनी ही आस्था और अनुशासन के साथ अंजाम दिया जाता है, जैसे सदियों पहले दिया जाता था। पूरे शहर में इस जुलूस को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग जुटे।

100 तलवारों के साथ विशेष जुलूस की शुरुआत

इस ऐतिहासिक हायदोष जुलूस की शुरुआत इमामबाड़ा हाता चौक से हुई। स्थानीय प्रशासन की ओर से इस परंपरा के लिए विशेष रूप से करीब 100 तलवारें उपलब्ध कराई जाती हैं, जिनका उपयोग निर्धारित प्रतिभागियों द्वारा पारंपरिक प्रदर्शन के दौरान किया जाता है। जुलूस त्रिपोलिया गेट, ताशं बावड़ी और महुआ तालाब से होकर आगे बढ़ता हुआ फिर से इमामबाड़ा पर जाकर समाप्त हुआ।

सिर्फ खास समुदाय को मिलता है प्रदर्शन का अधिकार

इस परंपरा में केवल ‘सैयद जाति पंचायत 52 कूटिया’ (खुद्दाम-ए-ख्वाजा) के सदस्य और युवा ही भाग लेते हैं। नियमों के अनुसार, इस आयोजन में किसी अन्य व्यक्ति को तलवार चलाने या हायदोष में शामिल होने की अनुमति नहीं होती। यह परंपरा वर्षों से इसी अनुशासन और धार्मिक मर्यादा के साथ निभाई जा रही है, जिसे समुदाय अपनी सांस्कृतिक पहचान मानता है।

ढोल-नगाड़ों और तोपों की गूंज से गूंजा शहर

जुलूस के दौरान ढोल-नगाड़ों की थाप और शहनाई की धुन लगातार सुनाई देती रही, वहीं बीच-बीच में तोपों की आवाज ने माहौल को और भव्य बना दिया। जैसे-जैसे जुलूस आगे बढ़ता रहा, वैसे-वैसे पारंपरिक तोपचालन भी चलता रहा। इस पूरे आयोजन के पीछे ‘दुलदुल शरीफ’ की सवारी भी निकाली गई, जो आमा बावड़ी तक पहुंची, जहां सलातो-सलामी के बाद इस ऐतिहासिक परंपरा का समापन हुआ।

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Stv News Rajasthan

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