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सोना बन रहा वैश्विक ताकत, डॉलर की पकड़ ढीली, बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था में अमेरिका की बादशाहत को सीधी चुनौती

दुनिया भर में सोने और चांदी की कीमतों में जिस तेजी से उछाल देखा जा रहा है, वह केवल बाजार की मांग या निवेशकों की सट्टेबाज़ी का नतीजा नहीं है। इसके पीछे वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में हो रहा एक गहरा बदलाव है, जो आने वाले वर्षों में अंतरराष्ट्रीय व्यापार और आम आदमी की जेब—दोनों को प्रभावित कर सकता है।


क्या है ‘डी-डॉलराइजेशन’ का संकेत?

क्यों दुनिया धीरे-धीरे डॉलर से बना रही दूरी
आर्थिक विशेषज्ञ इस बदलाव को ‘De-Dollarization’ कह रहे हैं, यानी वैश्विक लेन-देन में अमेरिकी डॉलर की निर्भरता को कम करना। दशकों तक डॉलर दुनिया की सबसे भरोसेमंद मुद्रा माना गया, लेकिन अब कई देश इस एकछत्र व्यवस्था से बाहर निकलने की रणनीति बना रहे हैं।


अमेरिकी बॉन्ड से दूरी की शुरुआत

भारत-चीन समेत कई देशों ने घटाया निवेश
अब तक अमेरिका को सुरक्षित मानकर कई देश अपने विदेशी मुद्रा भंडार का बड़ा हिस्सा US Treasury Bonds में रखते थे। लेकिन हाल के वर्षों में यह भरोसा कमजोर पड़ा है।


नवंबर 2024 में भारत के पास लगभग 21.5 लाख करोड़ रुपये के अमेरिकी बॉन्ड थे

नवंबर 2025 तक भारत ने इनमें से करीब 4.36 लाख करोड़ रुपये के बॉन्ड बेच दिए

चीन ने भी एक साल में करीब 8 लाख करोड़ रुपये के अमेरिकी बॉन्ड्स से निवेश घटाया


ब्राज़ील, आयरलैंड और अन्य देश भी इसी दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं।

डॉलर की जगह सोने पर बढ़ता भरोसा
केंद्रीय बैंकों की रणनीति में बड़ा बदलाव
अमेरिकी बॉन्ड बेचकर जो डॉलर वापस आ रहे हैं, उनका बड़ा हिस्सा अब सोना खरीदने में लगाया जा रहा है। केंद्रीय बैंक कागज़ी मुद्रा की बजाय ठोस संपत्ति को प्राथमिकता दे रहे हैं।


भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की हिस्सेदारी 15% से अधिक हो चुकी है

2021 से 2025 के बीच भारत ने लगभग 1.26 लाख किलोग्राम सोना खरीदा

चीन ने चार वर्षों में 3.5 लाख किलोग्राम से अधिक सोना अपने भंडार में जोड़ा


रूस-यूक्रेन युद्ध से टूटा भरोसा
डॉलर को ‘हथियार’ बनाने का डर

रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान अमेरिका द्वारा रूस के डॉलर रिज़र्व को फ्रीज किए जाने से दुनिया को एक सख्त संदेश मिला—डॉलर अब पूरी तरह सुरक्षित नहीं रहा। किसी भी देश का रिज़र्व राजनीतिक फैसलों की वजह से फंस सकता है, लेकिन सोने को फ्रीज नहीं किया जा सकता। यही वजह है कि अनिश्चितता के दौर में देश सोने को प्राथमिकता दे रहे हैं।


अमेरिका के वर्चस्व पर सवाल
डॉलर की गिरती साख और ट्रम्प की चेतावनी

पिछले एक साल में डॉलर की कीमत में लगभग 11% की गिरावट दर्ज की गई है और यह चार साल के निचले स्तर के करीब है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि जो देश डॉलर छोड़कर वैकल्पिक मुद्राओं में व्यापार करेंगे, उन पर प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।


इतिहास से अब तक का सफर
ब्रेटन वुड्स से BRICS तक
1944 में ब्रेटन वुड्स समझौते के तहत डॉलर को वैश्विक मुद्रा का दर्जा मिला


1971 तक डॉलर के बदले सोना देने की गारंटी थी, जिसे बाद में खत्म कर दिया गया

एक समय दुनिया का 80% व्यापार डॉलर में होता था

अब यह घटकर लगभग 54% रह गया है

BRICS देशों द्वारा स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और चीन द्वारा युआन को बढ़ावा देना इस बदलाव को तेज कर रहा है।

आम आदमी पर क्या पड़ेगा असर?


सोना, तेल और आयातित सामान हो सकते हैं महंगे


यदि डी-डॉलराइजेशन की प्रक्रिया तेज होती है, तो सोने की मांग और कीमतों में और उछाल संभव है। इसके साथ ही वैश्विक व्यापार नियमों में बदलाव से:

पेट्रोल-डीजल की कीमतों में उतार-चढ़ाव

आयातित सामान महंगे होने की आशंका

निवेश के नए ट्रेंड उभर सकते हैं

यह साफ संकेत है कि दुनिया एक नए आर्थिक संतुलन की ओर बढ़ रही है, जहां सोना फिर से ताकत की मुद्रा बनता दिख रहा है।

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