यहाँ हर साल एक माह तक मनाया जाता है गोदांबा महोत्सव… और इसी दौरान भगवान वेंकटेश को पहनाई जाती है उतरी माला — यानी वह माला, जो पहले गोदांबा जी की प्रतिमा को अर्पित की जाती है…
और फिर उतारकर भगवान को समर्पित की जाती है। पहली नज़र में यह परंपरा भले अनोखी लगे, लेकिन इसके पीछे जुड़ी है सदियों पुरानी आध्यात्मिक परंपरा… और एक गहरा दक्षिण भारतीय सांस्कृतिक संबंध। आस्था, भक्ति और परंपरा का यह अनूठा संगम… कैसे पहुंचा राजस्थान से लेकर दक्षिण भारत की धार्मिक धरोहर तक — कहानी जानिए, हमारी इस खास रिपोर्ट में…
“दक्षिण से राजस्थान तक… आस्था की अद्भुत परंपरा”
एक मंदिर… एक अनोखी परंपरा… और आस्था का ऐसा सफ़र, जो दक्षिण भारत से निकलकर राजस्थान की धरती तक आ पहुँचा है।
अलवर के रामकिशन कॉलोनी स्थित वेंकटेश बालाजी दिव्यधाम में शुरू हुआ गोदांबा महोत्सव भक्तों की आस्था का बड़ा केंद्र बना हुआ है।
इस महोत्सव की खास पहचान — वह दिव्य परंपरा, जिसमें गोदांबा देवी की प्रतिमा से उतारी गई माला भगवान वेंकटेश को पहनाई जाती है… और यही परंपरा यहाँ श्रद्धा का सबसे बड़ा प्रतीक बन चुकी है।
यह सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं…
बल्कि दक्षिण भारतीय वैष्णव परंपरा और राजस्थान की संस्कृति के अद्भुत संगम की जीवंत तस्वीर है।
कहते हैं —
कलियुग के 98वें वर्ष, दक्षिण भारत के श्रीविल्लीपुत्तूर नगर में संत विष्णुचित्त भगवान रंगनाथ के लिए प्रतिदिन तुलसी और पुष्पों की मालाएँ बनाते थे।
इसी नगर के तुलसी उपवन में एक दिन कमल के पुष्प पर प्रकट हुई एक दिव्य बालिका…
यही थीं गोदांबा जी।
विष्णुचित्त ने उन्हें अपनी पुत्री के रूप में अपनाया।
बचपन से ही उनका मन भक्ति में लीन रहने लगा —
और वे भगवान को ही अपना आराध्य… अपना जीवनसाथी मान बैठीं।
कहानी बताती है —
भगवान के लिए बनी माला को गोदांबा जी पहले स्वयं पहनकर देखतीं…मानो अपने आपको भगवान के योग्य परख रही हों।
पिता ने जब मना किया तो गोदांबा ने दृढ़ स्वर में कहा —
“मेरी भक्ति सच्ची है… भगवान स्वयं इस माला को स्वीकार करेंगे।”
इसके बाद उन्होंने 30 दिनों का व्रत रखा… भक्ति और तप में स्वयं को समर्पित कर दिया।
और फिर… हुई आकाशवाणी —
भगवान ने विष्णुचित्त से कहा —
“अपनी पुत्री का विवाह करो… मैं स्वयं उसके साथ परिणय करूँगा।”
कथा के अनुसार, भगवान एक 16 वर्षीय राजकुमार के रूप में प्रकट हुए…
माला धारण की… और गोदांबा जी के साथ अपने श्रीविग्रह में समाहित हो गए।
तभी से यह परंपरा स्थापित हुई…
कि गोदांबा जी की प्रतिमा से उतरी माला भगवान वेंकटेश को पहनाई जाए।
पूजा अनुष्ठान, संत-महंत, भोग, आरती
आज भी यही स्मृति
गोदांबा महोत्सव के रूप में जीवित है।
हर वर्ष 16 दिसंबर से 14 जनवरी तक चलने वाला यह आयोजन
रामानुज संप्रदाय की सात्तूमुरा पूजा विधि के साथ सम्पन्न होता है।
पूजा के दौरान भगवान की 16 वस्तुओं से अर्चना
और खिचड़ी भोग चढ़ाया जाता है —
ठीक वैसे ही… जैसे सदियों से दक्षिण भारतीय मंदिरों में होता आया है।
सांस्कृतिक संगम, भक्तों की भीड़, भजन-कीर्तन
एक महीने तक मंदिर परिसर भजन, कीर्तन, मंगला आरती और धार्मिक अनुष्ठानों से गूंजता रहता है।
अलवर ही नहीं… देशभर से आने वाले श्रद्धालुओं के साथ
दक्षिण भारत से पधारने वाले संत-महात्मा
इस परंपरा को और भी आध्यात्मिक और गरिमामय बना देते हैं।
यह परंपरा सिर्फ आस्था नहीं…
बल्कि भारत की साझा आध्यात्मिक विरासत का प्रमाण है —
जहाँ परंपराएँ सीमाएँ नहीं बनातीं…
बल्कि संस्कृतियों को जोड़ती हैं।
अलवर की धरती पर दक्षिण भारतीय परंपरा का यह अद्भुत संगम…
यकीन दिलाता है कि भक्ति की भाषा एक ही होती है — और वह है विश्वास।