नेशनल हेराल्ड केस में ईडी की चुनौती: गांधी परिवार पर कानूनी शिकंजा कसने की कोशिश, 9 मार्च को हाई कोर्ट में सुनवाई
नई दिल्ली: दिल्ली हाई कोर्ट ने नेशनल हेराल्ड से जुड़े कथित धनशोधन मामले में निचली अदालत के आदेश को चुनौती देने वाली प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की याचिका पर 9 मार्च को सुनवाई तय की है। ईडी ने उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें निचली अदालत ने कांग्रेस नेताओं— सोनिया गांधी, राहुल गांधी और अन्य के खिलाफ दाखिल अभियोजन शिकायत पर संज्ञान लेने से इनकार कर दिया था।
हाई कोर्ट ने जवाब के लिए दिया अतिरिक्त समय
न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा ने प्रतिवादी पक्ष को जवाब दाखिल करने के लिए अतिरिक्त समय दिया। ईडी की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने देरी पर आपत्ति जताई और कहा कि नोटिस पहले ही जारी हो चुका था। उन्होंने दलील दी कि मामला कानून की व्याख्या से जुड़ा है और निचली अदालत के निष्कर्ष अन्य मामलों में बाधा बन रहे हैं।
निचली अदालत के आदेश पर ईडी की आपत्ति
ईडी का कहना है कि निचली अदालत ने आरोपों पर संज्ञान न लेकर कानूनी रूप से गलत आधार अपनाया। एजेंसी के मुताबिक, दिए गए कारण स्पष्ट रूप से त्रुटिपूर्ण हैं और इससे धनशोधन मामलों की जांच-प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
22 दिसंबर को जारी हुआ था नोटिस
दिल्ली हाई कोर्ट ने 22 दिसंबर को मुख्य याचिका और निचली अदालत के आदेश पर रोक संबंधी आवेदन पर नोटिस जारी किया था। निचली अदालत ने 16 दिसंबर, 2025 के आदेश में कहा था कि एजेंसी की शिकायत कानूनन स्वीकार्य नहीं है, क्योंकि यह प्राथमिकी के आधार पर नहीं थी।
किन-किन को मिला नोटिस
हाई कोर्ट ने गांधी परिवार के अलावा सुमन दुबे, सैम पित्रोदा, यंग इंडियन, डोटेक्स मर्चेंडाइज प्राइवेट लिमिटेड और सुनील भंडारी को नोटिस जारी किया। ईडी ने इस मामले में दिवंगत मोतीलाल वोरा और ऑस्कर फर्नांडीस के नाम भी साजिश के आरोप में शामिल किए हैं।
ईडी का आरोप: संपत्तियों पर अवैध कब्जे का दावा
ईडी के अनुसार, नेशनल हेराल्ड की प्रकाशक कंपनी एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड से जुड़ी करीब 2,000 करोड़ रुपये की संपत्तियों पर कथित रूप से गलत तरीके से नियंत्रण हासिल किया गया। एजेंसी का दावा है कि यंग इंडियन में गांधी परिवार की बहुमत हिस्सेदारी के चलते 90 करोड़ रुपये के ऋण के बदले एजेएल की संपत्तियों पर कब्जा किया गया।
प्राथमिकी नहीं होने पर निचली अदालत की टिप्पणी
निचली अदालत ने कहा था कि धनशोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत कार्रवाई तब वैध मानी जा सकती है, जब अनुसूचित मूल अपराध के संबंध में प्राथमिकी दर्ज हो। अदालत के मुताबिक, यहां जांच निजी शिकायत के आधार पर शुरू हुई थी, न कि प्राथमिकी के जरिए।
निजी शिकायत से शुरू हुई जांच पर सवाल
यह मामला भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी की शिकायत से जुड़ा है। निचली अदालत के अनुसार, समन जारी होने के बावजूद केंद्रीय जांच ब्यूरो ने अनुसूचित अपराध में प्राथमिकी दर्ज नहीं की, जिससे अभियोजन की वैधानिकता पर प्रश्न खड़े होते हैं।
ईडी की दलील: निजी शिकायत होने से छूट नहीं मिल सकती
ईडी का तर्क है कि केवल इस आधार पर राहत देना कि अनुसूचित अपराध निजी शिकायत से सामने आया, धनशोधन करने वालों को अनुचित छूट देना होगा। एजेंसी का कहना है कि लगाए गए आरोप गंभीर हैं और केवल न्यायिक दृष्टांतों के आधार पर उन्हें खारिज नहीं किया जा सकता।