धर्म के मार्गदर्शन से ही भारत बनेगा विश्वगुरु: मोहन भागवत
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने एक बार फिर भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक भूमिका पर जोर देते हुए कहा है कि जब तक भारत धर्म के मार्गदर्शन में आगे बढ़ता रहेगा, तब तक वह विश्वगुरु बना रहेगा। उन्होंने समाज, शासन और व्यक्ति के जीवन में धर्म की भूमिका को निर्णायक बताया।
🟠 धर्म केवल आस्था नहीं, सृष्टि का संचालन तंत्र
मोहन भागवत ने कहा कि धर्म केवल पूजा-पाठ या धार्मिक पहचान तक सीमित नहीं है, बल्कि वही शक्ति है जो सृष्टि के संचालन और संतुलन को बनाए रखती है। धर्म ही वह नियम है जिससे प्रकृति, समाज और मानव जीवन अनुशासित रहता है।
🟠 भारत की आध्यात्मिक विरासत दुनिया के लिए मार्गदर्शक
संघ प्रमुख ने कहा कि भारत को अपने पूर्वजों से समृद्ध आध्यात्मिक विरासत मिली है। साधु-संतों और ऋषियों के विचारों ने सदियों तक समाज को दिशा दी है, जबकि दुनिया के कई हिस्सों में आध्यात्मिक दृष्टि का अभाव दिखता है।
🟠 पहले जाति पेशे से जुड़ी थी, बाद में बनी भेद का कारण
उन्होंने कहा कि प्रारंभ में जाति का संबंध पेशे और कार्य विभाजन से था, लेकिन समय के साथ यह सामाजिक भेदभाव का कारण बन गई। इसी विकृति को सुधारने की आवश्यकता है।
🟠 धर्मनिरपेक्ष राज्य संभव, लेकिन धर्मविहीन समाज नहीं
संघ प्रमुख ने स्पष्ट किया कि राज्य धर्मनिरपेक्ष हो सकता है, लेकिन कोई भी समाज या मानव धर्म के बिना नहीं रह सकता। धर्म का अर्थ नैतिक कर्तव्य और अनुशासन है, न कि केवल धार्मिक पहचान।
🟠 संघ का लक्ष्य: भारत को गौरव दिलाना, समाज को साथ लेकर चलना
भागवत ने कहा कि RSS का उद्देश्य भारत को उसका सर्वोच्च गौरव दिलाना है और यह तभी संभव है जब समाज का हर वर्ग साथ चले।
🟠 जातिगत भेदभाव खत्म करने का रास्ता मन से होकर जाता है
भागवत ने कहा कि यदि जातिगत भेदभाव को समाप्त करना है, तो सबसे पहले जाति की भावना को मन से मिटाना होगा। उन्होंने विश्वास जताया कि यदि यह ईमानदारी से किया जाए, तो 10 से 12 वर्षों में जातिवाद स्वतः समाप्त हो सकता है।