केरलम के बाद ‘इंद्रप्रस्थ’? दिल्ली के नाम बदलने की मांग से छिड़ी नई बहस…
सांसद प्रवीण खंडेलवाल ने गृह मंत्री को लिखा पत्र
केरल का नाम आधिकारिक रूप से ‘केरलम’ किए जाने के बाद अब देश की राजधानी दिल्ली का नाम बदलने को लेकर बहस शुरू हो गई है। दिल्ली से भारतीय जनता पार्टी के सांसद प्रवीण खंडेलवाल ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर दिल्ली का नाम ‘इंद्रप्रस्थ’ करने की मांग की है। उनका कहना है कि राजधानी का नाम उसके प्राचीन सांस्कृतिक और ऐतिहासिक स्वरूप के अनुरूप होना चाहिए।
बदले गए शहरों के नामों का दिया हवाला
सांसद ने अपने पत्र में यह तर्क भी रखा कि देश के कई बड़े शहरों के नाम पहले ही बदले जा चुके हैं। उदाहरण के तौर पर मुंबई (पूर्व में बॉम्बे), कोलकाता (कलकत्ता), चेन्नई (मद्रास) और बेंगलुरु (बैंगलोर) का उल्लेख किया गया। सांसद के अनुसार, दिल्ली का ऐतिहासिक नाम ‘इंद्रप्रस्थ’ रहा है, इसलिए राष्ट्रीय राजधानी का नाम भी उसी पहचान को दर्शाना चाहिए।
इंद्रप्रस्थ और महाभारत काल से जुड़ा दिल्ली का इतिहास
इतिहास और परंपराओं के अनुसार, प्राचीन काल में दिल्ली को इंद्रप्रस्थ कहा जाता था। यह नगर महाभारत काल में पांडवों द्वारा बसाया गया माना जाता है। मान्यता है कि यह क्षेत्र तत्कालीन कुरुक्षेत्र क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण भाग था और राजनीतिक व सांस्कृतिक दृष्टि से इसका विशेष महत्व रहा है।
‘दिल्ली’ नाम की उत्पत्ति को लेकर क्या कहते हैं ग्रंथ और मान्यताएं
लोककथाओं और कुछ ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि राजा ढिल्लू या दिलू ने इस क्षेत्र में शासन किया था, जिनके नाम से धीरे-धीरे ‘ढिल्लू’, ‘दिलू’ होते हुए ‘दिल्ली’ नाम प्रचलन में आया। इस संदर्भ में स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा रचित सत्यार्थ प्रकाश का हवाला भी दिया जाता है, जिसमें इस क्षेत्र के प्राचीन शासकों का उल्लेख मिलता है।
इतिहासकारों में मतभेद, एकमत नहीं
हालांकि, आधुनिक इतिहासकार दिल्ली नाम की उत्पत्ति और राजा ढिल्लू के काल को लेकर एकमत नहीं हैं। कुछ विद्वान उन्हें मौर्य काल से जोड़ते हैं, तो कुछ उनका समय ईसा पूर्व पहली शताब्दी के आसपास मानते हैं। ऐतिहासिक साक्ष्यों की सीमित उपलब्धता के कारण इस विषय पर अलग-अलग मत देखने को मिलते हैं।
नाम बदलने की मांग पर आगे क्या?
दिल्ली का नाम बदलने को लेकर उठी यह मांग फिलहाल चर्चा और पत्राचार तक सीमित है। किसी भी आधिकारिक बदलाव के लिए केंद्र सरकार और संसद स्तर पर निर्णय प्रक्रिया से गुजरना होगा। आने वाले समय में यह मुद्दा राजनीतिक और सामाजिक बहस का विषय बना रह सकता है।