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कोटपूतली में बीएलओ ने की आत्महत्या: नीम के पेड़ पर लटका मिला शव, परिजनों ने SDM पर प्रताड़ना का आरोप लगाया

Rajasthan Kotputli BLO Suicide Case:
राजस्थान के कोटपूतली में फिर एक बार बीएलओ की आत्महत्या का मामला सामने आया है, जिसने प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मृतक के परिवार ने सीधे-सीधे एसडीएम पर मानसिक प्रताड़ना के आरोप लगाए हैं। क्या यह सिर्फ व्यक्तिगत तनाव का मामला है या सिस्टम की दबावपूर्ण कार्यप्रणाली की वजह से एक और जान गई है? आइए पूरे मामले को समझते हैं…

“रात में नहीं लौटा घर, सुबह मिला शव”

कोटपूतली में बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) विजय गुर्जर की मौत ने पूरे इलाके को झकझोर दिया। देर रात तक घर नहीं लौटने पर परिवार ने तलाश शुरू की। घर से कुछ ही दूरी पर नीम के पेड़ के नीचे पहुंचने पर परिजनों ने विजय को फंदे से लटका हुआ देखा। आनन-फानन में उसे जिला अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया।

“परिजनों का आरोप—एसडीएम कर रहे थे प्रताड़ित”

मृतक के परिवार का दावा है कि विजय लंबे समय से काम के अत्यधिक दबाव और अफसरों के व्यवहार से परेशान था। परिजनों ने सीधे-सीधे SDM रामवतार मीणा पर मानसिक प्रताड़ना का आरोप लगाया है। परिवार का कहना है कि लगातार काम का दबाव और तानों से विजय टूट चुका था।

“दो बच्चों के सिर से उठा पिता का साया”

विजय गुर्जर अपने पीछे दो बच्चों का परिवार छोड़ गया है—17 साल का बेटा और 15 साल की बेटी। अचानक हुई इस त्रासदी ने परिवार की दुनिया ही बदल दी है। परिजन सदमे की हालत में हैं और इंसाफ की मांग कर रहे हैं।

“डिप्रेशन में था बीएलओ, चाचा ने किया खुलासा”

विजय के चाचा बुधराम गुर्जर ने बताया कि घटना से कुछ ही घंटे पहले शाम 5 बजे उनकी मृतक से बात हुई थी। उन्होंने बताया कि विजय काफी दिनों से अवसाद में था और काम का बोझ उसकी मानसिक स्थिति पर बुरा असर डाल रहा था। उनका कहना है कि वह बेहद चिंतित और तनावग्रस्त लग रहा था।

“प्रशासनिक हलचल—SDM और पुलिस मौके पर पहुंचे”

मौत की खबर मिलते ही SDM रामवतार मीणा, तहसीलदार रामधन गुर्जर और पुलिस अधिकारी अस्पताल पहुंचे। फिलहाल पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है और मामले की जांच शुरू कर दी है। प्रशासन पर आरोप लगने के बाद मामला और गंभीर हो गया है।

क्या सिस्टम का दबाव ले रहा है जानें?

राजस्थान में बीएलओ और सरकारी कर्मचारियों द्वारा आत्महत्या के मामले पिछले कुछ समय में बढ़े हैं। लगातार काम का दबाव, चुनावी तैयारियों का तनाव और अफसरों के सख्त रवैये की शिकायतें आम होती जा रही हैं। यह घटना प्रशासनिक ढांचे में मौजूद मनोवैज्ञानिक दबाव को उजागर करती है।
अब बड़ा सवाल यह है—
🔹 क्या प्रशासन अपने कर्मचारियों का मानसिक स्वास्थ्य देखने में असफल हो रहा है?
🔹 क्या दबाव आधारित सिस्टम कर्मचारियों की जान ले रहा है?
इस मामले की जांच इन सवालों के जवाब भी देगी।

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