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बिहार के एडवोकेट जनरल पीके शाही ने दिया इस्तीफा, कानूनी और राजनीतिक गलियारों में बढ़ी हलचल

बिहार के महाधिवक्ता (एडवोकेट जनरल) प्रशांत कुमार शाही के इस्तीफे ने राज्य के राजनीतिक और कानूनी हलकों में नई चर्चा छेड़ दी है। राज्य सरकार के सबसे वरिष्ठ कानूनी सलाहकार माने जाने वाले पीके शाही ने अचानक अपने पद से इस्तीफा देकर सभी को चौंका दिया। उनकी पहचान केवल एक वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में ही नहीं, बल्कि बिहार सरकार के भरोसेमंद कानूनी रणनीतिकार और पूर्व कैबिनेट मंत्री के रूप में भी रही है। उनके इस्तीफे के बाद अब राज्य में नए एडवोकेट जनरल की नियुक्ति को लेकर अटकलें तेज हो गई हैं।

35 वर्ष की उम्र में रचा था इतिहास

प्रशांत कुमार शाही का कानूनी सफर बिहार के न्यायिक इतिहास में एक विशेष स्थान रखता है। वर्ष 1990 में वे मात्र 35 वर्ष की उम्र में पटना हाईकोर्ट के सबसे युवा सरकारी वकील (गवर्नमेंट प्लीडर) बने थे। यह उपलब्धि आज भी उनके नाम दर्ज है। कानून की गहरी समझ, प्रभावशाली दलीलों और प्रशासनिक मामलों पर मजबूत पकड़ के कारण उन्होंने जल्द ही अपनी अलग पहचान बना ली। सरकारी मामलों में उनकी भूमिका इतनी प्रभावशाली रही कि वे राज्य और केंद्र सरकार दोनों के लिए महत्वपूर्ण कानूनी सलाहकार बनकर उभरे।

BHU से पढ़ाई के बाद शुरू हुआ शानदार करियर

3 जुलाई 1955 को जन्मे पीके शाही ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) से विधि की पढ़ाई पूरी की। 1979 में कानून की डिग्री हासिल करने के बाद उन्होंने पटना हाईकोर्ट में वकालत शुरू की। शुरुआती दौर से ही उनकी कानूनी समझ और तर्कशक्ति ने उन्हें अन्य वकीलों से अलग पहचान दिलाई। कुछ ही वर्षों में वे हाईकोर्ट के प्रमुख अधिवक्ताओं में गिने जाने लगे। उनकी पेशेवर ईमानदारी और कानून की बारीकियों पर पकड़ ने उन्हें कई महत्वपूर्ण संवैधानिक और प्रशासनिक मामलों में सफलता दिलाई।

केंद्र सरकार और रेलवे का भी संभाला पक्ष

राज्य स्तर पर सफलता मिलने के बाद पीके शाही को राष्ट्रीय स्तर पर भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिलीं। वर्ष 2001 में उन्हें भारत सरकार का वरिष्ठ स्थायी अधिवक्ता नियुक्त किया गया। इसके अलावा उन्होंने भारतीय रेलवे के लिए भी वरिष्ठ कानूनी सलाहकार की भूमिका निभाई। इस दौरान उन्होंने कई जटिल मामलों में केंद्र सरकार और सार्वजनिक संस्थानों का पक्ष मजबूती से अदालतों के सामने रखा। कानूनी क्षेत्र में उनके अनुभव और दक्षता ने उन्हें देश के प्रमुख अधिवक्ताओं की श्रेणी में स्थापित किया।

नीतीश सरकार में मंत्री बनकर निभाई बड़ी जिम्मेदारी

पीके शाही केवल अदालतों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि सक्रिय राजनीति और प्रशासन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वर्ष 2010 में वे नीतीश कुमार मंत्रिमंडल में शामिल हुए और शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी संभाली। बाद में उन्हें पर्यावरण, वन तथा योजना एवं विकास जैसे महत्वपूर्ण विभाग भी सौंपे गए। मंत्री रहते हुए उन्होंने कई नीतिगत फैसलों में योगदान दिया और बिहार के प्रशासनिक ढांचे को मजबूत करने में भूमिका निभाई। 2015 तक मंत्री पद पर रहने के बाद उन्होंने राजनीति से दूरी बनाकर फिर से वकालत पर ध्यान केंद्रित किया।

दूसरी बार बने बिहार के एडवोकेट जनरल

जनवरी 2023 में बिहार सरकार ने एक बार फिर पीके शाही पर भरोसा जताते हुए उन्हें राज्य का एडवोकेट जनरल नियुक्त किया। इससे पहले भी वे इस पद पर कार्य कर चुके थे। अपने दूसरे कार्यकाल में उन्होंने सरकार के कई महत्वपूर्ण मामलों में कानूनी मार्गदर्शन दिया और अदालतों में राज्य का पक्ष मजबूती से रखा। उनकी गिनती उन चुनिंदा कानूनी विशेषज्ञों में होती है जिन्होंने प्रशासन, राजनीति और न्यायिक व्यवस्था तीनों क्षेत्रों में प्रभावशाली भूमिका निभाई।

इस्तीफे के बाद नए महाधिवक्ता की तलाश शुरू

पीके शाही के इस्तीफे के बाद अब बिहार सरकार नए एडवोकेट जनरल की नियुक्ति की तैयारी में जुट गई है। सूत्रों के अनुसार, पटना हाईकोर्ट के कई वरिष्ठ अधिवक्ताओं के नामों पर विचार किया जा रहा है। चूंकि एडवोकेट जनरल राज्य सरकार का सर्वोच्च कानूनी सलाहकार होता है, इसलिए इस पद पर नियुक्ति को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। राजनीतिक और कानूनी गलियारों में अब यह चर्चा तेज हो गई है कि सरकार किस अनुभवी चेहरे को यह जिम्मेदारी सौंपेगी।

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