भिवाड़ी की अरावली छलनी: पहाड़ गायब, गहरे गड्ढे और नुकीली चट्टानें बन गईं पहचान….
अरावली बचाओ मुहिम के बीच खैरथल-तिजारा जिले के भिवाड़ी क्षेत्र से सामने आई तस्वीरें पर्यावरण के लिए खतरे की बड़ी चेतावनी बनकर उभरी हैं। दिल्ली-NCR से सटे कहरानी इलाके में अरावली की पहाड़ियां लगभग समाप्त हो चुकी हैं। जहां कभी हरियाली और पहाड़ी श्रृंखला थी, वहां अब नुकीली चट्टानें, खतरनाक गड्ढे और उजड़ा हुआ भू-दृश्य नजर आता है। यह हालात वर्षों तक चले अंधाधुंध अवैध खनन की गवाही दे रहे हैं।
अरावली की रीढ़ टूटी, पहाड़ बन गए टावर जैसी चट्टानें
कहरानी क्षेत्र की अरावली पहाड़ियों में इतने बड़े स्तर पर खनन हुआ कि आज पहाड़ों का अस्तित्व लगभग खत्म हो चुका है। स्थानीय लोगों के अनुसार, पहाड़ियों को काटकर पत्थर निकाल लिया गया और केवल ऊर्ध्वाधर, टावर जैसी नुकीली चट्टानें ही बची हैं। कई जगह जमीन में 40 से 50 फीट तक गहरे गड्ढे बन गए हैं, जो हादसों को न्योता दे रहे हैं।
दिल्ली-NCR की इमारतों में लगा अरावली का पत्थर
ग्रामीणों का दावा है कि इसी क्षेत्र से निकाला गया पत्थर दिल्ली, नोएडा और NCR के बड़े-बड़े निर्माण प्रोजेक्ट्स में इस्तेमाल हुआ। वर्षों तक रात-दिन डंपर चलते रहे और सैकड़ों ट्रक रोजाना पत्थर ढोते थे। यह अवैध खनन न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुंचाता रहा, बल्कि मानव जीवन के लिए भी खतरा बना रहा।
सुप्रीम कोर्ट की नई परिभाषा ने बढ़ाई चिंता
सुप्रीम कोर्ट में अरावली की नई परिभाषा को लेकर चली बहस के बाद यह मुद्दा फिर सुर्खियों में आ गया है। प्रस्तावित परिभाषा के अनुसार 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों को अरावली मानने से इनकार किया जा सकता है। जबकि 2010 की फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया रिपोर्ट बताती है कि अरावली की 12 हजार पहाड़ियों में से केवल करीब 8 प्रतिशत ही 100 मीटर से अधिक ऊंची हैं। ऐसे में अधिकांश पहाड़ियों का संरक्षण खतरे में पड़ सकता है।
670 किलोमीटर लंबी अरावली में सबसे ज्यादा मार NCR क्षेत्र में
दिल्ली से गुजरात तक फैली 670 किलोमीटर लंबी अरावली श्रृंखला में सबसे अधिक क्षति दिल्ली-NCR से सटे इलाकों में हुई है। कहरानी क्षेत्र में वर्ष 2002 से 2012 के बीच लगभग 2.5 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में अवैध खनन दर्ज किया गया। चौपानकी, हसनपुर, उधनवास, तिजारा, किशनगढ़बास, नीमराणा, बानसूर और शाहजहांपुर सहित करीब 300 स्थानों पर खनन माफिया सक्रिय रहे।
50 हजार करोड़ का नुकसान, पर्यावरणीय क्षति अपूरणीय
विशेषज्ञों के अनुसार इस क्षेत्र से अरबों-खरबों रुपये के खनिज अवैध रूप से निकाले गए। वर्ष 2014 में अलवर डीएफओ द्वारा एनजीटी के आदेश पर कराए गए आकलन में करीब 50 हजार करोड़ रुपये की वन और खनिज संपदा के नुकसान का अनुमान लगाया गया। हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि पर्यावरणीय क्षति इससे कहीं अधिक है, जिसकी भरपाई संभव नहीं।
ग्रामीणों की गवाही—“दस साल में पहाड़ गायब हो गया”
जोड़िया गांव के चरवाहे हकमू बताते हैं कि 2002 में शुरू हुआ अवैध खनन केवल दस वर्षों में पूरे पहाड़ को निगल गया। उनके अनुसार, दिन-रात डंपर चलते थे, कई हादसे हुए और कई लोगों की जान भी गई। कई स्थानों पर खनन इतना गहरा हुआ कि वहां पानी भर गया और छोटे तालाब बन गए।
2012 में सख्ती, खनन पर लगी रोक
वर्ष 2012 में सरकार की सख्ती के बाद तत्कालीन आईजी इंटेलिजेंस टी. गुइटे और आईएफएस अधिकारी पी. काथिरवेल के नेतृत्व में बड़ी कार्रवाई हुई। 200 से अधिक मामले दर्ज किए गए और अवैध खनन पर काफी हद तक रोक लगी। हालांकि दबाव के चलते अधिकारियों का तबादला भी किया गया।
शांति लौटी, पर सवाल अब भी कायम
2013 के बाद से क्षेत्र में अवैध खनन लगभग बंद है। अब डंपरों का शोर थम चुका है और लोग धीरे-धीरे खेती-बाड़ी की ओर लौट रहे हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल अब भी कायम है—क्या अरावली को हुए नुकसान की भरपाई कभी हो पाएगी, या आने वाली पीढ़ियां सिर्फ गड्ढों और खंडहरों की कहानी सुनेंगी?