चीन के साथ अरबों डॉलर की रक्षा डील पर बांग्लादेश में बहस, J-10CE फाइटर जेट खरीद योजना पर उठे सवाल
बांग्लादेश और चीन के बीच संभावित रक्षा सहयोग को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ढाका चीन से J-10CE मल्टीरोल फाइटर जेट खरीदने पर विचार कर रहा है। संभावित रक्षा सौदे की लागत कई अरब डॉलर बताई जा रही है। हालांकि, इस प्रस्ताव को लेकर बांग्लादेश के भीतर भी सवाल उठ रहे हैं कि क्या विकास संबंधी चुनौतियों के बीच इतनी बड़ी रक्षा खरीद उचित होगी।
J-10CE फाइटर जेट खरीद पर चल रही चर्चा
रिपोर्ट्स के अनुसार, बांग्लादेश चीन से 20 से 24 J-10CE मल्टीरोल फाइटर जेट खरीदने की संभावनाओं पर बातचीत कर रहा है। यदि यह सौदा अंतिम रूप लेता है तो इसकी कीमत कई अरब डॉलर हो सकती है। चीन इस विमान को आधुनिक 4.5-जनरेशन लड़ाकू विमान के रूप में पेश करता है, जिसमें AESA रडार, उन्नत मिसाइल प्रणाली और मल्टी-रोल ऑपरेशन जैसी क्षमताएं होने का दावा किया जाता है। हालांकि, कुछ अंतरराष्ट्रीय रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इसकी युद्ध क्षमता पर अभी भी अलग-अलग राय मौजूद है।
रक्षा खर्च बनाम विकास पर उठे सवाल
बांग्लादेश के अखबार ढाका ट्रिब्यून में प्रकाशित विश्लेषण में इस संभावित रक्षा सौदे की जरूरत और प्राथमिकताओं पर सवाल उठाए गए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और कौशल विकास जैसे क्षेत्रों में अभी भी बड़े निवेश की आवश्यकता है। ऐसे में रक्षा क्षेत्र पर भारी खर्च को लेकर व्यापक बहस हो रही है कि क्या यह देश की मौजूदा आर्थिक और सामाजिक जरूरतों के अनुरूप है।
चीन के साथ बढ़ते रणनीतिक संबंधों पर नजर
रिपोर्ट्स के मुताबिक, दोनों देशों के बीच केवल रक्षा सहयोग ही नहीं, बल्कि सैन्य तकनीक, बुनियादी ढांचा परियोजनाओं और आर्थिक निवेश को लेकर भी बातचीत जारी है। विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी रणनीतिक साझेदारी से पहले उसके दीर्घकालिक आर्थिक और सुरक्षा प्रभावों का सावधानी से आकलन किया जाना चाहिए। विश्लेषकों का एक वर्ग यह भी मानता है कि किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता भविष्य में रणनीतिक चुनौतियां पैदा कर सकती है।
आधिकारिक पुष्टि का इंतजार
फिलहाल बांग्लादेश या चीन की ओर से इस संभावित रक्षा सौदे को लेकर कोई अंतिम आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है। ऐसे में यह स्पष्ट नहीं है कि J-10CE फाइटर जेट खरीद का प्रस्ताव किस चरण में है। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यह समझौता आगे बढ़ता है तो इसका असर दक्षिण एशिया की क्षेत्रीय सुरक्षा और सामरिक संतुलन पर भी पड़ सकता है।