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अरावली की नई परिभाषा के विरोध में अशोक गहलोत ने शुरू किया ‘Save Aravalli’ अभियान…….

राजस्थान के वरिष्ठ कांग्रेस नेता और पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सुप्रीम कोर्ट की नई अरावली परिभाषा के विरोध में ‘Save Aravalli’ अभियान का समर्थन किया है। उन्होंने अपनी सोशल मीडिया प्रोफाइल पिक्चर (DP) बदलकर इस आंदोलन में भागीदारी जताई। गहलोत ने कहा कि यह सिर्फ फोटो बदलना नहीं, बल्कि अरावली संरक्षण के लिए एक जागरूकता और विरोध का संदेश है।


गहलोत ने क्या कहा:-

अशोक गहलोत ने लिखा कि नई परिभाषा के तहत 100 मीटर से कम ऊँचाई वाली पहाड़ियों को अरावली नहीं माना जाएगा, जिससे उत्तर भारत के पर्यावरण और भविष्य पर गंभीर खतरा है। उन्होंने कहा:

  1. अरावली ‘ग्रीन वॉल’ की तरह काम करती है, जो थार रेगिस्तान की रेत और गर्म हवाओं को दिल्ली, हरियाणा और यूपी के उपजाऊ मैदानों की ओर बढ़ने से रोकती है। छोटी पहाड़ियों को खोने से रेगिस्तान और लू का असर बढ़ सकता है।
  2. अरावली पहाड़ियाँ और जंगल NCR और आसपास के शहरों के ‘फेफड़ों’ के रूप में कार्य करते हैं। ये धूल भरी आंधियों और प्रदूषण को कम करने में अहम हैं।
  3. अरावली की चट्टानें बारिश का पानी भूमिगत भेजकर भूजल रिचार्ज करती हैं। अगर पहाड़ियां खत्म हो गईं, तो भविष्य में पीने के पानी की कमी और वन्यजीवों के लुप्त होने की समस्या बढ़ेगी।

गहलोत ने कहा कि अरावली एक निरंतर शृंखला है। छोटी पहाड़ियाँ भी उतनी ही अहम हैं जितनी बड़ी चोटियां। यदि इस शृंखला में एक भी हिस्सा कम हुआ, तो सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी।


मामला सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद और गंभीर

सुप्रीम कोर्ट ने नीलगिरी पर्वत मामले में अरावली की नई परिभाषा दी है। रिपोर्ट के अनुसार, अरावली का लगभग 90% हिस्सा 100 मीटर से कम ऊँचाई का है। अब इन क्षेत्रों को कानूनी तौर पर अरावली पर्वत नहीं माना जाएगा, जिससे खनन और अन्य मानव गतिविधियों के लिए रास्ता खुल सकता है।


भविष्य की चिंता

गहलोत और पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह निर्णय राजस्थान और उत्तर भारत के पारिस्थितिकी तंत्र पर गंभीर असर डाल सकता है। उन्होंने नागरिकों से अपील की है कि वे DP बदलकर अभियान में शामिल हों और अरावली की रक्षा के लिए जागरूकता फैलाएँ।


जनता और प्रशासन की भूमिका

विशेषज्ञ और नागरिक समूह भी ‘Save Aravalli’ अभियान के समर्थन में हैं। उनका कहना है कि केवल सरकारी फैसलों पर भरोसा करना पर्याप्त नहीं है; लोगों की सक्रिय भागीदारी और जन आंदोलन ही अरावली की रक्षा सुनिश्चित कर सकता है।

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