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महापरिनिर्वाण दिवस: संविधान निर्माता डॉ. आंबेडकर को नमन, सामाजिक न्याय की लौ आज भी प्रज्वलित

आज पूरा देश डॉ. भीमराव अंबेडकर की पुण्यतिथि पर उनके विचारों, संघर्षों और सामाजिक परिवर्तन के लिए किए गए अतुलनीय योगदान को स्मरण कर रहा है। महापरिनिर्वाण दिवस सिर्फ एक दिन नहीं, बल्कि समाज में बराबरी और अधिकारों की लड़ाई को आगे बढ़ाने का संकल्प है।

महापरिनिर्वाण दिवस: डॉ. आंबेडकर की पुण्यतिथि पर राष्ट्र का श्रद्धांजलि दिवस

हर साल 6 दिसंबर को मनाया जाने वाला महापरिनिर्वाण दिवस भारतीय संविधान के शिल्पकार डॉ. बी.आर. अंबेडकर को समर्पित है। यह दिन सामाजिक न्याय, समता और मानवाधिकारों के लिए उनके आजीवन संघर्ष को याद करने का अवसर देता है।
बौद्ध परंपरा में महापरिनिर्वाण जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति का प्रतीक है, और इसी आध्यात्मिक पृष्ठभूमि के कारण डॉ. आंबेडकर की पुण्यतिथि को भी ‘महापरिनिर्वाण दिवस’ के रूप में विशेष महत्व प्राप्त है।

आंबेडकर और बौद्ध दर्शन: महापरिनिर्वाण का गहरा अर्थ

बौद्ध ग्रंथ ‘महापरिनिर्वाण सुत्त’ भगवान बुद्ध के अंतिम उपदेश और मृत्यु का वर्णन करता है, जिसे परम मुक्ति का क्षण कहा गया है। डॉ. आंबेडकर ने जीवन के अंतिम चरण में बौद्ध धर्म अपनाकर समाज सुधार को एक नई दिशा दी।
महापरिनिर्वाण दिवस इस आध्यात्मिक विरासत और सामाजिक सुधार के सिद्धांतों की पुनर्पुष्टि का भी अवसर है।

सामाजिक संघर्ष से संवैधानिक महानता तक डॉ. आंबेडकर का सफर

14 अप्रैल 1891 को एक दलित परिवार में जन्मे डॉ. आंबेडकर का शुरुआती जीवन संघर्षों से भरा रहा। जातिगत भेदभाव और सामाजिक उपेक्षा के बावजूद उन्होंने ज्ञान के मार्ग को चुना और बाधाओं को अवसर में बदल दिया।
आंबेडकर की शिक्षा यात्रा कोलंबिया विश्वविद्यालय, लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स और ग्रेज़ इन जैसी दुनिया की शीर्ष संस्थाओं से होकर गुजरी, जहां उन्होंने डॉक्टरेट सहित कई सम्मान प्राप्त किए।

भारत रत्न और राष्ट्र निर्माता: डॉ. आंबेडकर का अतुलनीय योगदान

भारतीय संविधान के मुख्य निर्माता के रूप में डॉ. आंबेडकर ने आधुनिक भारत की न्याय व्यवस्था और लोकतांत्रिक ढांचे को मजबूत आधार दिया। सामाजिक समानता, आरक्षण नीति और वंचितों को अधिकार दिलाने के उनके प्रयास आज भी भारतीय व्यवस्था की धुरी हैं।
उनकी सेवाओं को सम्मान देते हुए वर्ष 1990 में उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न से अलंकृत किया गया।

महापरिनिर्वाण दिवस सिर्फ स्मरण नहीं, बदलाव का संकल्प भी

महापरिनिर्वाण दिवस हमें याद दिलाता है कि डॉ. आंबेडकर का मिशन केवल कानून लिखना नहीं था, बल्कि समाज की मानसिकता बदलना भी था। आज भी जातिगत भेदभाव, असमानता और मानवाधिकारों की चुनौतियाँ मौजूद हैं—इसलिए यह दिवस सभी नागरिकों के लिए आत्ममंथन का अवसर है।
डॉ. आंबेडकर का संदेश स्पष्ट है—शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो।
यह दिन उसी मार्ग पर आगे बढ़ने का प्रेरक है।

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