“SC की सख्ती: कॉमेडियन अब चलाएंगे दिव्यांग जागरूकता अभियान”
सुप्रीम कोर्ट ने 27–28 नवंबर 2025 की सुनवाई में कॉमेडियनों को निर्देश दिए हैं कि वे अपनी डिजिटल प्लेटफॉर्म-शोज़ में दिव्यांगों की सफलता-कहानियों को दिखाकर संवेदनशीलता बढ़ाएँ और इलाज के लिए धन जुटाएँ — साथ ही कोर्ट ने केंद्र से ऐसे आपत्तिजनक टिप्पणियों को अपराध तय करने वाले कड़े कानून पर विचार करने को कहा।
ताज़ा अपडेट — कोर्ट का निर्देश और क्या कहा गया
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने समाय रैना, विपुल गोयल, बलराज परविंदर सिंह घई, सोनाली ठक्कर और निशांत तंवर से कहा है कि वे ऐसे कार्यक्रम आयोजित करें जिनमें खासकर स्पाइनल मस्कुलर अट्रॉफी (SMA) जैसी दुर्लभ बीमारियों से जूझ रहे लोगों की सफलता-कहानियाँ और चिकित्सा सहायता की ज़रूरतों पर प्रकाश डाला जाए। कोर्ट ने कम-से-कम महीने में दो कार्यक्रम आयोजित करने का निर्देश दिया।
निर्देश का उद्देश्य — धन और सम्मान दोनों
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इन कार्यक्रमों का उद्देश्य सिर्फ फंड उठाना नहीं है, बल्कि समाज में दिव्यांगता के प्रति सम्मान व समझ बढ़ाना भी है। अदालत ने यह सुझाया कि कार्यक्रमों में दिव्यांगों को आमंत्रित करके उनकी कहानियाँ और संघर्ष सामने लाए जाएं ताकि जागरूकता बढ़े और इलाज-सम्बन्धी फंड आसानी से जुट सके।
मामला किसने दायर किया — Cure SMA फाउंडेशन की याचिका
यह निर्देश Cure SMA Foundation की याचिका पर दिया गया, जिसमें ऑनलाइन कंटेंट में उन जोक्स पर रोक लगाने और दिव्यांगों की गरिमा की रक्षा के लिए कदम उठाने की माँग की गई थी। याचिकाकर्ता ने उदाहरण के रूप में ऐसे हास्य-विनोद का हवाला दिया जिसे दिव्यांगता का अपमान माना गया।
सख्त कानून की बात — SC-ST जैसे प्रावधान पर सुझाव
बेंच (चीफ जस्टिस सुर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची) ने केंद्र से कहा कि वह इस दिशा में सोचें कि क्या किसी विशेष कानून के माध्यम से दिव्यांग व्यक्तियों का अपमान या उनका मज़ाक उड़ाना दंडनीय क़रार दिया जा सकता है — कुछ न्यायालयों ने इसे SC/ST एक्ट जैसी कड़े प्रावधानों के बराबर लागू करने का विकल्प सुझाया। सॉलिसिटर-जनरल तुषार मेहता ने भी कहा कि हास्य किसी की गरिमा के ख़िलाफ़ नहीं होना चाहिए।
कंटेंट रेगुलेशन — स्वतंत्र संस्था की ज़रूरत
कोर्ट ने यह भी कहा कि सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर आपत्तिजनक सामग्री रोकने के लिए एक स्वतंत्र संस्था आवश्यक हो सकती है। सूचना-प्रसारण मंत्रालय को निर्देश दिए गए कि वह ऑनलाइन कंटेंट के लिये दिशानिर्देश पेश करे — सरकार ने कहा कि गाइडलाइन पर काम चल रहा है।
यह विवाद इस साल के पहले से चले आ रहे मामलों की कड़ी के रूप में देखा जा रहा है— समाय रैना और कुछ अन्य कॉमेडियनों के शो में कुछ ऐसे रिमार्क्स को लेकर शिकायतें उठीं जो दिव्यांगों की संवेदनशीलता को चोट पहुँचाने वाले माने गए। इससे पहले भी कोर्ट ने ऐसी टिप्पणियों पर सार्वजनिक माफ़ी और जवाबदेही की बात कह चुके हैं।
क्या बदलेगा और क्या चुनौतियाँ हैं
प्रभाव-व्यापकता: अदालत का निर्देश सैद्धान्तिक तौर पर डिजिटल क्रिएटर्स को सामाजिक ज़िम्मेदारी की याद दिलाता है — मगर इसे लागू करना प्लैटफ़ॉर्म-निगरानी, दर्शक-रूचि और क्रिएटर की आज़ादी के बीच संतुलन मांगता है।
कानून बनना कठिन: SC-ST जैसी कड़ी व्यवस्था की तरह किसी नए कानून में ‘अपमान’ की परिभाषा, दंड और मिसयूज़ की रोकथाम साफ़ करनी होगी — वरना अभिव्यक्ति-स्वतंत्रता और अतिरंजित दंड के दावों के साथ टकराव संभव है।
व्यावहारिकता: दो कार्यक्रम प्रति माह जैसी संख्या ज़मीनी स्तर पर क्रिएटर की क्षमताओं और दर्शकों की सहमति पर निर्भर करेगी — छोटे-माध्यम वाले क्रिएटरों के लिए सहायता-ढाँचे की आवश्यकता पड़ सकती है।
आगे का रास्ता — क्या उम्मीद रखी जा सकती है
अगले चरणों में सरकार की गाइडलाइन, किसी संभावित विधेयक-प्रस्ताव और सुनवाई के दौरान दिए जाने वाले ठोस निर्देश अहम रहेंगे। न्यायालय ने फिलहाल सामाजिक जिम्मेदारी पर जोर दिया है; यदि केंद्र नियमन के लिए क़ानूनी मसौदे लेकर आता है तो यह डिजिटल मीडिया के नियमन के एक नए अध्याय की शुरुआत हो सकती है।