Rajasthan: नागौर के किसान का अनोखा विरोध—फसल बीमा न मिलने पर खेत में बो दिए 500-500 के नोट, वीडियो वायरल….
राजस्थान के नागौर जिले में एक किसान द्वारा किया गया अनोखा विरोध पूरे सोशल मीडिया पर चर्चा में है। कपास की फसल बर्बाद होने के बावजूद बीमा क्लेम न मिलने से नाराज़ किसान ने खेत में 500-500 रुपये के नोट बोकर अपना गुस्सा जाहिर किया और उसका वीडियो बनाकर सार्वजनिक कर दिया। यह कदम सरकारी सिस्टम और बीमा कंपनियों की लापरवाही पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।
📌 फसल बीमा न मिलने से आक्रोश—किसान का प्रतीकात्मक विरोध वायरल
देवरिया जाटान गांव के किसान मल्लाराम बावरी की कपास की पूरी फसल अतिवृष्टि की वजह से खराब हो गई। बीमा कंपनी से मुआवजा नहीं मिलने पर उन्होंने खेत में ही 500 के नोट बो दिए और उसका वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट किया, जो तेजी से वायरल हो गया।
📌 शिकायत के बावजूद बीमा कंपनी के अधिकारी मौके पर नहीं पहुंचे
मल्लाराम ने बताया कि उन्होंने फसल बोने के लिए बैंक से एक लाख रुपये का कर्ज लिया था। मगर भारी बारिश से फसल नष्ट होने के बाद मात्र 4,000 रुपये की ही उपज मिली।
बीमा कंपनी की हेल्पलाइन पर शिकायत दर्ज कराने के बावजूद कोई अधिकारी खेत की वास्तविक स्थिति देखने नहीं आया, जिससे किसान की नाराजगी और बढ़ गई।
📌 सरकारी व्यवस्था से निराश किसान ने सोशल मीडिया को बनाया हथियार
बीमा राशि न मिलने और जांच न होने से परेशान किसान ने खेत में नोट बोने का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डाल दिया। इस अनोखे विरोध ने आम लोगों से लेकर राजनीतिक हलकों तक में चर्चा छेड़ दी।
किसान का कहना है कि यह कदम राज्य के कृषि तंत्र और बीमा कंपनियों की सुस्ती के खिलाफ उनकी पीड़ा को दर्शाता है।
📌 लगातार बारिश से कपास की फसल पूरी तरह बर्बाद—खेत में पानी भरने से बिगड़े हालात
किसान ने बताया कि भारी बारिश के दौरान खेत में पानी का तालाब भी टूट गया था, जिससे पूरा खेत जलमग्न हो गया। लंबे समय तक पानी भरने के कारण कपास की फसल पूरी तरह सड़ गई और उनका पूरा निवेश डूब गया।
📌 विश्लेषण: किसानों के लिए बीमा योजनाएँ—जमीन पर अब भी कमजोर कड़ी
यह घटना एक बार फिर दिखाती है कि फसल बीमा योजनाएँ कागज़ों पर भले मजबूत दिखती हों, लेकिन जमीनी स्तर पर किसानों तक राहत पहुंचाने में बड़ी खामियां हैं।
बीमा कंपनियों का मौके पर जाकर नुकसान का आकलन न करना, देरी से भुगतान और लापरवाही जैसे मुद्दे किसानों में अविश्वास पैदा कर रहे हैं।
मल्लाराम का विरोध इसी टूटे भरोसे की झलक है, जो सिस्टम के सुधार की जरूरत को फिर सामने रखता है।