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राजस्थान कांग्रेस में नई जंग : संगठन की मजबूती से उठे नए नेतृत्व के सवाल…

राजस्थान कांग्रेस में संगठन विस्तार की रफ्तार तेज है, लेकिन इसी के साथ 2028 की सत्ता का सवाल भी उतनी ही तेजी से उठ खड़ा हुआ है। डोटासरा की सक्रियता, गहलोत की राजनीतिक पकड़ और पायलट की पुरानी मेहनत—इन तीन स्तंभों के बीच कांग्रेस का भविष्य तय होना दिखाई दे रहा है। क्या दोबारा सत्ता मिली तो कमान किसके हाथ जाएगी? प्रदेश की राजनीति इसी पर केंद्रित होती जा रही है।

राजस्थान में कांग्रेस के 45 जिलाध्यक्ष तय—डोटासरा की पकड़ सबसे मजबूत

राजस्थान के 50 में से 45 जिलों में नए जिलाध्यक्षों की नियुक्ति हो चुकी है। सूत्रों की मानें तो इनमें से 18 नाम प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा के करीबियों के हैं, जबकि 8 सचिन पायलट गुट और 9 अशोक गहलोत गुट को मिले हैं। यह सूची बताती है कि प्रदेश संगठन पर डोटासरा का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है।

संगठन को धार देने में डोटासरा की मेहनत—52 हजार बूथ अध्यक्ष भी बनाए

डोटासरा पिछले कुछ समय से संगठन को जमीनी स्तर तक मजबूत करने में लगे हैं। जिलाध्यक्षों के साथ–साथ प्रदेश के 52 हजार पोलिंग बूथों पर बूथ अध्यक्षों की नियुक्ति भी पूरी करवाई गई है।
दिलचस्प बात यह है कि इस कार्य के लिए पूर्व अध्यक्ष सचिन पायलट ने भी डोटासरा की खुलकर तारीफ की है।

2013–18 में पायलट ने संभाली थी डूबी हुई कांग्रेस—21 विधायकों से खड़ा किया बड़ा जनाधार

सचिन पायलट को जब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया था, तब पार्टी सिर्फ 21 विधायकों के साथ सीमित हो चुकी थी और पूरी तरह हताश दिख रही थी। पायलट ने विपक्ष में रहकर पूरे प्रदेश में सक्रिय आंदोलन किए, कई बार पुलिस की लाठियां भी झेलीं और संगठन को दोबारा खड़ा किया।
इसी मेहनत के दम पर कांग्रेस 2018 में फिर बहुमत में लौटी।

2018 में पायलट की मेहनत के बाद भी सीएम बने गहलोत—नाराज़गी का आधार यही

2018 के चुनाव के बाद व्यापक धारणा थी कि पायलट को मुख्यमंत्री बनाया जाएगा, लेकिन हाईकमान ने अशोक गहलोत को मौका दिया।
यही फैसला आगे चलकर राजस्थान कांग्रेस के भीतर दो खेमों के बीच तनाव की जड़ बना।

आज डोटासरा के पास पायलट से बेहतर स्थिति—9 सांसद और 66 विधायक बने मजबूत आधार

2013–18 में पायलट के पास केवल 21 विधायक थे, लेकिन आज प्रदेश कांग्रेस के पास 9 सांसद और 66 विधायक हैं।
यानी डोटासरा वर्तमान में संगठन को ऐसी स्थिति में संभाल रहे हैं, जहाँ संसाधन और संख्या दोनों बेहतर हैं।
पार्टी के भीतर यह तुलना लगातार होती दिख रही है कि “पायलट ने जैसा किया, अब वही रोल डोटासरा निभा रहे हैं।”

2028 की सत्ता किसके हाथ?—डोटासरा vs गहलोत vs पायलट की तिकड़ी पर राजनीति गर्म

2028 के विधानसभा चुनाव पर निगाहें टिक चुकी हैं।
डोटासरा गुट को पूरा भरोसा है कि बहुमत मिलने पर डोटासरा ही मुख्यमंत्री चेहरा बनेंगे।
दूसरी तरफ गहलोत समर्थक पहले ही नारा लगा रहे हैं—“चौथी बार गहलोत सरकार”।
पायलट के समर्थक मानते हैं कि 2018 में उनका हक छीना गया था, इसलिए 2028 में मौका उन्हें मिलना चाहिए।

पद न होते हुए भी सबसे सक्रिय गहलोत—सोशल मीडिया से लेकर दौरे तक फ्रंटफुट पर

अशोक गहलोत के पास भले ही कोई संगठनात्मक पद नहीं है, लेकिन उनकी सक्रियता प्रदेश कांग्रेस के बाकी नेताओं से कहीं अधिक है।
वे लगातार प्रदेशभर में दौरे कर रहे हैं, भाजपा सरकार की कमियां उजागर कर रहे हैं और अखबारों में लेख लिखकर राजनीतिक मौजूदगी बनाए हुए हैं।
गहलोत की खबरें आज भी सबसे ज्यादा प्रकाशित हो रही हैं।

पायलट राष्ट्रीय महासचिव—राजस्थान से बाहर जिम्मेदारियाँ, लेकिन महत्व के मौके पर मौजूद

सचिन पायलट कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और छत्तीसगढ़ के प्रभारी होने के कारण ज्यादातर समय राज्य से बाहर रहते हैं।
फिर भी जब भी प्रदेश संगठन या किसी बड़े आंदोलन की जरूरत होती है, वे राजस्थान लौट आते हैं।
उनके समर्थक चाहते हैं कि कांग्रेस अगर 2028 में सत्ता में आती है, तो मुख्यमंत्री बनना पायलट का हक बनना चाहिए।

गहलोत की हार–जीत का इतिहास—तीन बार सीएम रहते हुए तीनों बार कांग्रेस सत्ता से बाहर

यह तथ्य भी लगातार चर्चा में है कि गहलोत के तीन कार्यकालों में कांग्रेस हर बार अपनी सत्ता गंवा बैठी।
यही तर्क देते हुए पायलट और डोटासरा गुट के नेता कहते हैं कि अब नए नेतृत्व को मौका मिलना चाहिए।

संगठन मजबूत—लेकिन कांग्रेस में नेतृत्व का सवाल सबसे बड़ा मुद्दा

राजस्थान कांग्रेस आज मजबूत संगठन और बढ़ते जनाधार के साथ तैयार दिख रही है, लेकिन शीर्ष नेतृत्व का सवाल सबसे बड़ा विवाद रहेगा।
डोटासरा की मेहनत, गहलोत की पकड़ और पायलट की पुरानी पूँजी—तीनों के बीच संतुलन बनाना हाईकमान के लिए सबसे कठिन चुनौती होगी।
2028 की जीत तय करेगी कि कांग्रेस किसे आगे बढ़ाती है और राजस्थान का नेतृत्व किसके हाथ में जाता है।

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