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अलवर में प्याज किसानों की बदहाली: तीन रुपए किलो भाव से किसान बेहाल, खेतों में जोत रहे फसल…

किसानों पर टूटा आर्थिक संकट
अलवर जिले में इन दिनों प्याज किसानों की हालत बद से बदतर होती जा रही है। मंडियों में प्याज के दाम तीन से दस रुपए किलो तक गिर गए हैं, जिससे किसानों को भारी नुकसान झेलना पड़ रहा है। कभी ‘कर्ज मुक्ति की फसल’ कही जाने वाली प्याज अब किसानों को कर्जदार बना रही है। अनुमान है कि जिले में करीब 400 करोड़ रुपए का नुकसान किसानों को हो चुका है।

मंडी में भाव गिरे, किसान नहीं ला रहे प्याज

अलवर मंडी के व्यापारियों के अनुसार रोजाना 20 से 25 हजार कट्टे प्याज की आवक हो रही है, लेकिन भाव इतने कम हैं कि किसान अपनी लागत भी नहीं निकाल पा रहे। अधिकांश प्याज तीन से सात रुपए किलो बिक रही है। व्यापारी पप्पू भाई का कहना है कि प्याज में नमी के कारण इसे लंबे समय तक स्टोर नहीं किया जा सकता, इसलिए किसान मजबूर होकर रोज ही प्याज बेच रहे हैं।

निर्यात ठप, बाहरी बाजारों में नहीं जा रही अलवर की प्याज
पहले अलवर की प्याज भारत के 16 राज्यों और नेपाल, भूटान, बांग्लादेश जैसे देशों में निर्यात होती थी, लेकिन इस बार निर्यात लगभग बंद है। पाकिस्तान और बांग्लादेश को प्याज नहीं भेजे जाने से बड़े व्यापारियों को भी घाटा उठाना पड़ रहा है। व्यापारी बताते हैं कि भारत के विदेशी संबंधों और निर्यात नीति की सीमाओं के चलते प्याज का निर्यात रुक गया है।

फसल में रोग और घटा उत्पादन
रामगढ़ नाड़का के किसान नवाब खान ने बताया कि प्याज में इस बार रोग लगने से उत्पादन पर बुरा असर पड़ा है। जहां पहले एक बीघा में सौ कट्टे प्याज निकलती थी, अब केवल 20-25 कट्टे ही हो रहे हैं। प्याज की क्वालिटी कमजोर होने से बाजार में इसके दाम और नीचे चले गए हैं।

किसानों की आवाज: सरकार से मदद की मांग

किसान मुबारिक खान और अमीलाल ने कहा कि सरकार को तत्काल राहत पैकेज देना चाहिए। तीन से चार बीघा प्याज बोने के बावजूद किसान मजदूरी तक नहीं दे पा रहे। मजदूरों का भुगतान रुका है और कई किसानों ने फसल को सड़कों पर फेंक दिया। किसानों का कहना है कि कम से कम 30-35 रुपए किलो भाव मिलना चाहिए ताकि लागत पूरी हो सके।

अलवर के प्याज किसानों की यह हालत राज्य में कृषि संकट की गंभीर तस्वीर पेश करती है। गिरते दाम, निर्यात पर रोक और फसल की खराबी ने किसान की उम्मीदों को तोड़ दिया है। अब उनकी नजर सरकार की किसी राहत नीति पर टिकी है, जो इस आर्थिक झटके से उन्हें उबार सके।

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